यदि समाज वास्तव में बेहतर शिक्षा चाहता है तो उसे शिक्षक से प्रश्न पूछने के साथ-साथ स्वयं से भी प्रश्न पूछने होंगे
अक्सर कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का भाग्य उसके अच्छे शिक्षकों से बनता है। यह बात काफी हद तक सही भी है लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि समाज शिक्षक का मूल्यांकन जिन कसौटियों पर करता है, उन्हीं कसौटियों पर स्वयं को परखने का साहस शायद ही कभी जुटा पाता है। शिक्षा पर चर्चा शुरू होते ही सबसे पहले शिक्षक कटघरे में खड़ा दिखाई देता है

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कानपुर देहात। अक्सर कहा जाता है कि किसी व्यक्ति का भाग्य उसके अच्छे शिक्षकों से बनता है। यह बात काफी हद तक सही भी है लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि समाज शिक्षक का मूल्यांकन जिन कसौटियों पर करता है, उन्हीं कसौटियों पर स्वयं को परखने का साहस शायद ही कभी जुटा पाता है। शिक्षा पर चर्चा शुरू होते ही सबसे पहले शिक्षक कटघरे में खड़ा दिखाई देता है। ऐसा इसलिए नहीं कि शिक्षा की हर समस्या का स्रोत शिक्षक है बल्कि इसलिए कि समाज ने शिक्षक के लिए अपेक्षाओं का एक ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया है जिसे वह किसी अन्य पेशे के सामने रखने की कल्पना भी नहीं करता। शिक्षक से अपेक्षा की जाती है कि वह ज्ञानवान भी हो, चरित्रवान भी हो, संवेदनशील भी हो, आधुनिक भी हो, परिणाम देने वाला भी हो, बच्चों का मनोवैज्ञानिक भी हो, समाज सुधारक भी हो और हर बदलती सरकारी नीति के अनुरूप स्वयं को तत्काल ढाल लेने वाला एक आज्ञाकारी कर्मयोगी भी हो लेकिन जब बात उसके कार्य परिवेश, संसाधनों, प्रशिक्षण, सामाजिक सम्मान, मानसिक दबाव और पेशेगत गरिमा की आती है तो अचानक वही समाज कहने लगता है कि यह सब बहाने हैं। मानो शिक्षक का कर्तव्य तो अनंत है लेकिन उसके अधिकारों पर चर्चा करना अपराध हो।
सबसे बड़ा शिक्षाशास्त्रीय प्रश्न यही है कि क्या शिक्षा केवल शिक्षक की इच्छा शक्ति से संचालित होती है? शिक्षा का हर गंभीर शोध, हर प्रतिष्ठित आयोग और हर शिक्षाविद यह स्वीकार करता है कि सीखना एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें परिवार, समुदाय, संसाधन, भाषा, पोषण, सामाजिक वातावरण, प्रशासनिक संरचना और विद्यालयी संस्कृति सबकी भूमिका होती है लेकिन हमारे यहां शिक्षा की असफलताओं का ऐसा सरलीकरण किया जाता है मानो पूरी व्यवस्था में केवल एक ही व्यक्ति मौजूद हो वह सिर्फ शिक्षक। विडंबना यह है कि जो समाज स्वयं अपने बच्चों के सामने घंटों मोबाइल में डूबा रहता है, वह शिक्षक से पढ़ने की संस्कृति विकसित करने की अपेक्षा करता है। जो अभिभावक स्वयं पुस्तकों से वर्षों दूर रह चुके हैं, वे शिक्षक से बच्चों में अध्ययन की आदत पैदा करने की मांग करते हैं। जो व्यवस्था शिक्षक को पढ़ाने से अधिक समय रिपोर्ट, सर्वेक्षण, आंकड़ों, अभियानों और गैर-शैक्षिक कार्यों में उलझाए रखती है वही व्यवस्था फिर सीखने के स्तर गिरने पर सबसे पहले उसी शिक्षक की ओर उंगली उठाती है। यह वैसा ही है जैसे किसी धावक के पैरों में वजन बांधकर उससे दौड़ जीतने की अपेक्षा की जाए। शिक्षाशास्त्र हमें बताता है कि शिक्षा संबंधों पर चलती है, विश्वास पर चलती है, संवाद पर चलती है लेकिन शिक्षक को आज ऐसे वातावरण में काम करना पड़ रहा है जहां उस पर विश्वास कम और निगरानी अधिक है, सहयोग कम और मूल्यांकन अधिक है, सम्मान कम और संदेह अधिक है। हर कोई उससे जवाब मांग रहा है लेकिन उसके प्रश्न सुनने को तैयार नहीं है। हर कोई उससे परिणाम चाहता है लेकिन उसके संघर्षों को आंकड़ों की भीड़ में गायब कर देता है।
भावनात्मक स्तर पर देखें तो शिक्षक भी इसी समाज का एक साधारण मनुष्य है। वह किसी आश्रम में तपस्या करके नहीं आता। उसके भी परिवार हैं, आर्थिक चिंताएं हैं, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, सामाजिक दबाव हैं, सपने हैं और सीमाएं हैं लेकिन समाज उससे एक ऐसे आदर्श मनुष्य की अपेक्षा करता है जो थके नहीं, टूटे नहीं, शिकायत न करे, हर परिस्थिति में मुस्कुराए और हर असफलता की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर ले ले। यह अपेक्षा सम्मान से अधिक अन्याय है और शायद सबसे बड़ा अन्याय यह है कि समाज अपने हर संकट का समाधान शिक्षक में खोजता है लेकिन शिक्षक के संकटों का समाधान खोजने में उसकी कोई रुचि नहीं होती। बच्चों में अनुशासन नहीं है तो शिक्षक दोषी, सीखने का स्तर गिरा तो शिक्षक दोषी, समाज में नैतिकता घटी तो शिक्षक दोषी, रोजगार नहीं मिला तो शिक्षा दोषी और शिक्षा का चेहरा शिक्षक। यह सुविधाजनक व्यवस्था है क्योंकि इससे बाकी सभी लोग अपने हिस्से की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं इसलिए आवश्यकता शिक्षक का महिमामंडन करने की नहीं है बल्कि शिक्षा को ईमानदारी से समझने की है। शिक्षक कोई चमत्कारिक प्राणी नहीं है जो व्यवस्था की हर कमी को अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा से भर दे। वह एक महत्वपूर्ण कड़ी अवश्य है लेकिन अकेली कड़ी नहीं है। यदि समाज वास्तव में बेहतर शिक्षा चाहता है तो उसे शिक्षक से प्रश्न पूछने के साथ-साथ स्वयं से भी प्रश्न पूछने होंगे क्योंकि शिक्षा की गुणवत्ता केवल शिक्षक की नहीं पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी होती है और सच कहें तो जो शिक्षक तमाम उपेक्षाओं, दबावों, आलोचनाओं और सीमित संसाधनों के बीच भी हर सुबह कक्षा में खड़ा हो जाता है, बच्चों के चेहरों में भविष्य खोजता है और सीखने की उम्मीद को जीवित रखता है, वह किसी काल्पनिक आदर्श गुरु से अधिक सम्मान का पात्र है क्योंकि वह पूर्ण नहीं है, फिर भी प्रयासरत है। वह सर्वशक्तिमान नहीं है फिर भी जिम्मेदारी निभा रहा है और शायद शिक्षा की दुनिया में यही सबसे बड़ा साहस है।
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