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क्यों बन गया जोशीमठ एक टाइम बम जैसा?

आध्यात्मिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उत्तराखंड का प्राचीन शहर जोशीमठ जमीन धंसने की खबरों को लेकर पिछले कई दिनों से चर्चा में है।

आध्यात्मिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उत्तराखंड का प्राचीन शहर जोशीमठ जमीन धंसने की खबरों को लेकर पिछले कई दिनों से चर्चा में है। गढ़वाल हिमालय के अंदर आने वाले चमोली जिले में बसा है जोशीमठ। 6,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर ये शहर स्थित है। इसे बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, स्कीइंग डेस्टिनेशन औली और यूनेस्को वर्ल्ड हैरिटेज वैली ऑफ फ्लावर के प्रवेश द्वार के रूप में माना जाता है।जोशीमठ बद्रीनाथ का प्रवेशद्वार है। उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में जमीन धंसने, कई मकानों में दरार होने और धरती से पानी रिसने की घटना ने एक बार फिर इसे चर्चा में ला दिया है।हालांकि, आज जो हो रहा है उसकी जड़ में बेरोकटोक कंस्ट्रक्शन, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एक बड़ी वजह है। स्थानीय जनता सालों से इसके खिलाफ आवाज उठा रही है लेकिन आज जब दरकती जमीन की तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं, प्रशासन और सरकार फिर सवालों के घेरे में है।   स्थानीय प्रशासन के मुताबिक जोशीमठ में करीब 3 से 4 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। 25 से ज्यादा परिवारों को प्रशासन ने सुरक्षित जगह भेज दिया है।

इस घटना के पीछे जो वजह बताई जा रही है, वह एक सरकारी योजना ही है। जोशीमठ की स्थानीय जनता इसकी वजह NTPC की प्रोजेक्ट को बता रही है। इस प्रोजेक्ट में पहाड़ों को काटकर लंबी सुरंग बनाई जा रही है। लगभग 2 साल पहले ये प्रोजेक्ट शुरू हुआ था जिसके बाद से ही जमीन में दरार पड़ने के मामले सामने आने लगे थे।

कुछ अध्ययन पहले ही किए जा चुके हैं। 1976 की शुरुआत में मिश्रा समिति ने चेतावनी दी थी। सड़क की मरम्मत और दूसरे निर्माण के लिए समिति ने यह सलाह दी थी कि पहाड़ी को खोदकर या विस्फोट करके पत्थरों को न हटाया जाए। क्षेत्र के पेड़ों को बच्चों की तरह पाला जाना चाहिए।अभी हाल ही में, जून 2021 में स्थानीय निवासियों के अनुरोध पर गठित एक स्वतंत्र समिति ने इलाके का सर्वे किया और कहा कि खनन कार्य जोशीमठ को डुबो देंगे। इस कमिटी में जियोलॉजिस्ट नवीन जुयाल भी थे जो चार धाम की ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट के रिव्यू के लिए सुप्रीम कोर्ट की बनाई समिति में भी थे, उन्होंने मल्टि इंस्टिट्यूशनल एक्सपर्ट्स के सर्वे की बात कही थी।उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अगस्त 2022 में शहर के जियोलॉजिकल और जियोटेक्निकल सर्वे के लिए एक एक मल्टि इंस्टिट्यूशनल टीम का गठन किया। टीम ने सितंबर में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें बताया गया कि जोशीमठ “एक अस्थिर नींव पर खड़ा है जिसे बारिश, अनियमित कंस्ट्रक्शन से नुकसान पहुंच सकता है।कमजोर प्राकृतिक नींव के अलावा रिपोर्ट में कहा गया कि जोशीमठ-औली रोड के किनारे कई घर, रिसॉर्ट और छोटे होटल बना लिए गए हैं जो जमीन को कमजोर कर रहे हैं।

हालांकि, कई निवासी नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) की तपोवन-विष्णुगढ़ 520 मेगावाट के लिए बनाई जा रही 12 किलोमीटर लंबी सुरंग के निर्माण को जोशीमठ की परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। यह परियोजना फरवरी 2021 में अचानक आई बाढ़ की चपेट में आ गई थी जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए थे। सुरंग जोशीमठ से 15 किमी दूर तपोवन में परियोजना के बैराज से शुरू होती है और शहर से लगभग 5 किमी दूर सेलांग में इसके बिजलीघर पर समाप्त होती है।जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक बताया कि  17 मार्च 2010 को एनटीपीसी ने स्वीकार किया था कि “सुरंग में किए गए छेद से पानी रिस रहा है।।। हमारा कहना था कि इस वजह से ही जोशीमठ में जल स्रोत सूख रहे थे।

कुछ समय पूर्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा ने आगाह  किया था  कि जोशीमठ पर्वतीय क्षेत्र के अंदर सुराग एक लीकिंग गुब्बारे की तरह काम करेंगे। जिस तरह गुब्बारे से पानी रिसता है और धीरे धीरे उसका आकार खत्म हो जाता है, ऐसा ही कुछ इस इलाके के पहाड़ों में हो सकता है।हालांकि एनटीपीसी के अधिकारी हाल ही में स्थानीय मीडियाकर्मियों को सुरंग में ले गए थे और दावा किया कि यह सूखा था, इसलिए परियोजना के कारण जोशीमठ ‘डूब’ नहीं रहा था।

जोशीमठ के निवासियों के लिए यह कोई सांत्वना नहीं है। वे तो अभी तक “पुनर्वास” की मांग कर रहे हैं और अपने बेहतरीन शहर को बचाने के लिए आवाज उठा रहे हैं।65 वर्षीय निवासी चंद्रवल्लभ पांडे ने कहा कि सड़क और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर काम बेरोकटोक जारी है। ये पहले से ही अनिश्चित स्थिति को और गंभीर कर रहा है। यह सभी सरकारों की घोर लापरवाही से है कि हम अब जोखिम में हैं। दशकों पहले सचेत होने के बावजूद उन्होंने बहुमंजिला इमारतों और इतने निर्माण की अनुमति क्यों दी?खास बात यह भी है कि चीन सीमा के पास होने से जोशीमठ का सामरिक महत्व भी है। यहां सेना की ब्रिगेड और आईटीबीपी के कैंप भी हैं।

इससे पहले साल 2021 के फरवरी में ग्लेशियर टूटने के बाद मार्च से दरारें दिखनी शुरू हुईं। उसके बाद दरारें बड़ी होने लगीं। तब ऋषि गंगा घाटी में ग्लेशियर टूटने से उत्तराखंड में 200 से ज़्यादा लोगों की जान गई थी। जोशीमठ का धंसना नई बात नहीं है। साल 1976 की मिश्रा कमेटी रिपोर्ट में इसका ज़िक्र है। यूपी राज्य में रहने के दौरान बढ़ती जनसंख्या और भवनों के बढ़ते निर्माण के दौरान 70 के दशक में भी लोगों ने भूस्खलन की शिकायत की थी। उसके बाद जांच के लिए मिश्रा कमेटी बनी थी। इस कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ प्राचीन भूस्खलन क्षेत्र में है। यह शहर पहाड़ से टूटे बड़े टुकड़ों और मिट्टी के अस्थिर ढेर पर बसा है।

दरअसल जोशीमठ में 1962 के बाद बड़ी इमारतें बनने का सिलसिला शुरू हुआ था। चीन के साथ युद्ध के बाद इलाके में सड़कें बनाने का काम तेज हुआ। सेना के कैंप और हेलिपैड बनाने को भी जरूरी माना गया। शहर का महत्व इस लिहाज से बढ़ा तो यहां बसावट भी बढ़ी। कई होटल और कार्यालय खुले। औली और बदरीनाथ समेत हेमकुंट साहिब तीर्थ ने जोशीमठ को सैलानियों और तीर्थयात्रियों का पसंदीदा शहर बना दिया।लेकिन अब इस पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। देहरादून के वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से यह नतीजा निकाला है कि जोशीमठ का रविग्राम हर साल 85 मिलीमीटर की रफ़्तार से धंस रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बहुत खतरनाक स्थिति है। जोशीमठ धंस रहा है, ये जियोलॉजिकल ट्रूथ है। ये फैक्ट है, जिसके बारे में ऐसा नहीं है कि लोग पहले से नहीं जानते थे। लोग इस बारे में जानते थे। जब भी अख़बार जोशीमठ और इन इलाकों की रिपोर्टिंग करते थे तो अक्सर इस बारे में बातें भी होती थीं। उसकी वजह सिम्पली ये है कि जोशीमठ मोरेन पर बसा हुआ शहर है। कई सौ साल पहले जब यहां ग्लेशियर रहा होगा, उसके ऊपर जो रेत, मिट्टी और पत्थर होते हैं उस मलबे को मोरेन कहते हैं। ग्लेशियर पिघल कर पीछे हट गया और वो मलबे का जो पहाड़ है उसमें आने वाले दिनों में सभ्यता बसी। जैसा आप कह रहे थे कि औली विंटर स्पोर्ट्स का एक बहुत बड़ा गढ़ है। यहां पर टूरिस्ट आते हैं, वैली ऑफ फ्लावर्स देखने जाते हैं।

ये नैचुरली एक एंट्री पॉइंट है, टूरिजम और ऐडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए भी। उस लिहाज से यहां पर प्रेशर बढ़ता गया। फिर सरकार यहां पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर आई, जिसमें कम से कम दो बड़े प्रोजेक्ट यहां पर हैं। एक जेपी का प्रोजेक्ट है, एक एनटीपीसी का प्रोजेक्ट है। इसका जरूर मिलाजुलाकर इफेक्ट हुआ है। ये हम नहीं कह रहे हैं, यहां के भूगर्भशास्त्री कहते हैं। 1976 की जो रिपोर्ट है मिश्रा कमेटी की। पिछले साल दो कमेटियों ने अपनी ब्रीफ रिपोर्ट दी थी। एक रिपोर्ट जाने-माने जियोलॉजिस्ट डॉक्टर नवीन जुयाल की कमेटी की थी। दूसरी कमेटी खुद सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट के जानकारों की थी। दोनों रिपोर्ट को देखने से साफ पता चलता है कि उन्होंने यहां पर कंस्ट्रक्शन के खिलाफ अपनी राय दी है। ऐसी स्थिति जब होती है डिजास्टर मैनेजमेंट में तो दो तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। पहला ये है कि तुरंत क्या किया जाना है? यह लगभग 25,000 की आबादी वाला शहर है। उत्तराखंड के बहुत सारे ऐसे गांव हैं, जो ऊंचाई पर बसे हुए हैं और जहां डिजास्टर का खतरा है। वहां से उन्हें हटाने की लोगों को सलाह दी गई है। सरकार को जोशीमठ में जो करना चाहिए, कितना कर रही, नहीं मालूम। जो-जो मकानों में दरारें है, जहां सबसे ज्यादा खतरा है, जानकारों से बात करके वहां का निरीक्षण करके तुरंत लोगों को हटाना चाहिए। कई गांवों में मैं गया था 2021 में, जब वहां आपदा आई थी, उसके बाद भी। लोग उन गांवों में नहीं रहना चाहते हैं। उन्हें पता है कि गांव कभी भी दरक सकते हैं। पहली चीज तो ये है कि उन लोगों को हटाकर उनकी शिक्षा का, रहने का, खाने-पीने का इंतजाम करना होगा। इतनी ठंड वहां पर हो रही है, इन सब का इंतजाम करना होगा। पूरी तरह से सोचना होगा कि आगे कुछ सालों में हमें पूरी तरह से गांव हटाने पड़ेंगे। हो सकता है कुछ महीनों में ही हटाने पड़ें। सरकार को एक बहुत बड़ा पुनर्वास कार्यक्रम चलाना पड़ेगा। जैसे टिहरी के लिए चलाया गया। टिहरी शहर जब डूबा, बांध बना वहां पर तो सब लोगों को जमीनें दी गईं। उन्हें दूसरी जगह बसाया गया। लेकिन ये तो खुद खड़ी की गई समस्या है। विशेषज्ञों से बात करने के बाद और अपनी नजर से देखने के बाद एक ऑब्जर्वेशन के तौर पर कहा जा सकता है । ऐसा लगता है कि अब पॉइंट ऑफ नो रिटर्न है। यहां से अब लोगों को हटाना ही एक तरीका है। ये सोचना कि यहां पर कोई डिजास्टर नहीं होगा और लोग रह पाएंगे अपने घरों में, यह बड़ा मुश्किल लगता है।

खबर  तो यह भी आ रही थी कि कर्णप्रयाग जोशीमठ से दूर है काफी, जोशीमठ जाने के रास्ते में ही पड़ता है, लेकिन कर्णप्रयाग में भी ये समस्या दिखाई दे रही है। बहुत सारे गांव ऐसे हैं, जिनकी एग्ज़ैक्ट नंबर नहीं पता । सैकड़ों में वो नंबर है, जिन गांवों से रीलोकेट करने की बात सरकार के अपने जो डॉक्यूमेंट हैं, उनमें है। सरकार ने जो कमेटियां बनाई, विशेषज्ञ कमिटी, उन्होंने कहा है। जोशीमठ के पास ही  जो रैणी गांव है, वो तो हिल रहा है पूरी तरह से। लोग कह रहे हैं कि हिलता है, जब गाड़ी जाती है तो हमें डर लगता है, गिर जाएगा। वहां से लोगों ने भागना शुरू कर दिया। वहां पर चांई गांव है एक, वहां पर पहले बहुत अच्छे फल-फूल-सब्जियां होती थीं। इतनी ब्लास्टिंग और इतना ज्यादा परेशानी हुई कि सब बंद हो गईं। ये जो पानी है, उसकी हाइड्रोलॉजी बदल गई। इसी तरह से बहुत से गांव और हैं, जो इसी तरह दरक रहे हैं और वहां से लोगों को हटना जरूरी है। चमोली तो पूरा हिमालयी क्षेत्र के सबसे ज्यादा डिज़ास्टर प्रोन, संकटोन्मुख जो क्षेत्र हैं, उनमें है।

एक बात और जो यहाँ पर बहुत बड़े लेवल पर ब्लास्टिंग होती है। वो ब्लास्टिंग साइंटिफिकली कोई इंजीनियर नहीं कर रहा है। कोई ठेकेदार आता है, वो ब्लास्ट करता है। ब्लास्टिंग से पूरा पहाड़ हिलता है। ये बहुत ही ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र है। यहां पर टनलिंग हो रही है। वो टनल क्या है? जिसको लेकर झगड़ा चल रहा है, लोग उत्तेजित हैं। वो 12 किलोमीटर की है जो सेलंग से तपोवन जाती है। उन्होंने टनल के अंदर मशीन घुसाई हुई है। वो मशीन फंस गई तो उसको निकालने के लिए फिर पहाड़ को तोड़ना, फिर ब्लास्ट करना। पहले तो वहां पर पहले से ही नंदा देवी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी है। चलो उसकी आपको परवाह नहीं है, लेकिन फिर लोग वहां पर रह रहे हैं। अब लोगों का गुस्सा आ रहा है तो सरकार को साइंटिफिकली बात करनी चाहिए। अगर वो पर्यावरण के बारे में लोगों से बात नहीं भी करनी चाहते तो उनकी भी जो राय है वो वही है, जो मैं कह रहा हूं अभी।

जब भी कोई बात उठती है सरकार  विकास और पर्यावरण की बात करते  हैं। लेकिन विकास वैसा नहीं हो सकता ना, जैसा हम सोचते हैं कि निजामुद्दीन का हमारा सिक्स लेन-8 लेन हाईवे है, हम सोचते हैं कि वैसा हाईवे हम पहाड़ में बनाएं। पहाड़ में हमें सस्टेनेबल रोड चाहिए। सामरिक रूप से जो बार-बार हमें बताया जाता है और जो सच बात है, ये बहुत संवेदनशील इलाका है। चाइना बॉर्डर पर है तो सड़कें चाहिए, लेकिन कैसी सड़कें चाहिए। हमें ऐसी सड़कें चाहिए, जो सस्टेनेबल हों, जो कठिन मौसम में भी खड़ी रह सकें। वो चौड़ी सड़कें हों, ये जरूरी नहीं है। वो पर्याप्त चौड़ी सड़क हो, जितनी जरूरत है और सस्टेनेबल हो। पहाड़ को थोड़ा काटो और उसी की मिट्टी से सड़क बनाओ। अभी आप जाके देखिये वहां क्या होता है। पहाड़ को ब्लास्ट करते हैं, तोड़ते हैं और नदी में फेंक देते हैं। उससे नदी के बहाव क्षेत्र में असर पड़ता है। वो पहाड़ को और कमजोर करती है। पहाड़ जिस तरह से आप काट रहे हैं तो बाकी भूस्खलन बढ़ते हैं। विकास होगा, पर्यावरण का थोड़ा-बहुत नुकसान भी होगा। लेकिन जिसे हम सस्टेनेबल कहते हैं, समावेशी विकास, वो हो सकता है। यह सब जानने के बाद  यक्ष प्रश्न यही बनता है कि जोशीमठ एक टाइम बम बनाने कि व आज तक दुर्लक्ष करने की जिम्मेदारी किसकी बनती है ?अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जोशीमठ में भूमि धंसने और कस्बे के कई घरों में दरारें आने की खबर के मद्देनजर आवश्यक कार्रवाई शुरू करने के लिए मुख्यमंत्री धामी जल्द ही जोशीमठ का दौरा कर रहे है यदि यह सब पहले से होता तो 25,000 की आबादी वाला शहर एटम बन के मुहाने पर न बैठा होता ।

अशोक भाटिया

वरिष्ठ  लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार , मुंबई 

 

 

 

AMAN YATRA
Author: AMAN YATRA

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