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सुविधाएं बढ़ी फिर भी घट रही है परिषदीय स्कूलों में छात्र संख्या

परिषदीय स्कूलों से अभिभावकों का मोह भंग हो रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही परिषदीय स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ने की बात कर रहे हो लेकिन जिले में एक दो हजार नहीं बल्कि 20 हजार से अधिक छात्रों ने परिषदीय स्कूलों से दूरी बना ली है। सत्र 2022-23 में जिले के परिषदीय स्कूलों में करीब 1.6 लाख बच्चे नामांकित थे जबकि वर्तमान में करीब 1.4 लाख बच्चें ही नामांकित हैं

कानपुर देहात। परिषदीय स्कूलों से अभिभावकों का मोह भंग हो रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही परिषदीय स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ने की बात कर रहे हो लेकिन जिले में एक दो हजार नहीं बल्कि 20 हजार से अधिक छात्रों ने परिषदीय स्कूलों से दूरी बना ली है। सत्र 2022-23 में जिले के परिषदीय स्कूलों में करीब 1.6 लाख बच्चे नामांकित थे जबकि वर्तमान में करीब 1.4 लाख बच्चें ही नामांकित हैं। छात्रों की लगातार कम हो रही संख्या से बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों और शिक्षकों पर बड़े सवाल खड़े हो रहे है। जब प्रदेश सरकार परिषदीय स्कूलों में सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट खर्च कर रही हो तब लगातार गिर गई छात्र संख्या सुविधाओं के न मिलने का प्रमाण दे रही है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत छात्रों को स्कूल से जोड़ने की कोशिश की जा रही है लेकिन यह प्रयास कानपुर देहात में कोसों दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है। निजी स्कूलों को टक्कर देने की बात कहने वाले अधिकारी गिरती छात्र संख्या को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहे है।

सरकारी विद्यालयों में नामांकन लगातार घटने के प्रमुख कारण-
1️⃣प्रत्येक कक्षा में पर्याप्त शिक्षकों का न होना।
2️⃣गांव में रोजगार के साधन कम होने की वजह से कोरोना में गांव वापस आ गए परिवारों का पुन: शहरों के लिए पलायन हो जाना।
3️⃣बगैर मानकों के निजी विद्यालयों को मान्यता देना एवं गैर मान्यता प्राप्त विद्यालय भी बंद न होना। शिक्षक बच्चे के 6 साल पूरा होने का इंतजार करते रह जाते हैं जबकि प्राइवेट स्कूल वाले पहले ही 4 साल में ही उनका नर्सरी/एलकेजी/यूकेजी में एडमिशन कर लेते हैं।
4️⃣सरकारी विद्यालय में मूलभूत सुविधाओं की कमी का होना
प्रत्येक कक्षा के लिए अलग शिक्षक न होना और न ही हर कक्षा के लिए अलग कक्षा कक्ष होना। प्रत्येक विद्यालय में एक पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक न होना। बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सफाई कर्मी न होना जिससे स्कूलों में गंदगी रहती है, मच्छर आदि रहते हैं, शौचालय तक प्रतिदिन साफ नहीं होते। बच्चों की सुरक्षा के लिए चौकीदार न होना।स्वच्छ पेयजल के लिए वाटर कूलर / आरओ आदि न होना। गर्मी के मौसम में बिजली न आने पर बच्चों से भरी कक्षा में पंखे आदि उपकरण न चल पाना। बारिश के मौसम में जल भराव की स्थिति बन जाना और स्कूलों तक पहुँचने के रास्ते खराब हो जाना। ज्यादातर स्कूल 20 वर्षों से भी पुराने हैं जिनके भवनों में कभी भी कोई दुर्घटना घटित हो सकती है।सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को पूरे वर्ष गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाए रखना।

6️⃣समाज में सरकारी स्कूलों और उनके शिक्षकों की कार्य शैली को विभिन्न संचार के माध्यमों के नकारात्मक रूप में दर्शाना जिससे उनका मनोबल गिर रहा है और उनमे भी अपने कार्य के प्रति नकारात्मक भाव पनप रहा है।
7️⃣शिक्षकों की पदोन्नति, स्थानांतरण आदि समस्याओं का समय से निस्तारण न होना जिससे उनकी कार्य शैली भी प्रभावित हो रही है।
8️⃣सरकार को सोचना चाहिए कि सिर्फ एमडीएम खिलाने, डीबीटी के 1200 ₹ देने से बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा उसके लिए शिक्षकों को शिक्षण कार्य करने के लिए समय, माहौल, सुविधाएं, पर्याप्त शिक्षक देने होंगे।
9️⃣साथ ही सरकार को यह समझना होगा कि प्राइवेट स्कूलों में बेहतर शैक्षिक व्यवस्था होने का सबसे बड़ा कारण वहां प्रधानाध्यापक/प्रिंसिपल को अपने स्कूल को बेहतर बनाने के लिए मैनेजमेंट के द्वारा स्वतंत्र छोड़ा गया होता है लेकिन यहाँ तो प्रधानाध्यापक/प्रिंसिपल ही नहीं हैं केवल सूचना के आदान प्रदान और गला दबाने के लिए एक अनुभवी शिक्षक को मुफ्त का इंचार्ज बनाकर पकड़ रखा गया है। यही कारण है कि पूरे प्रदेश में पहली कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। संख्या बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बावजूद लगातार दूसरे साल बच्चों की संख्या में कमी आई है। इस साल दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या 12 लाख और कम हो गई है। दो साल के अंदर उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 24 लाख बच्चे कम हो गए हैं।

ऐसे आई गिरावट-
बच्चों की संख्या में बढ़ोत्तरी 2022-23 तक जारी रही। लेकिन अगले ही साल 2023-24 में बच्चों की संख्या तेजी से घट गई। इस पर महानिदेशक स्कूल शिक्षा कंचन वर्मा ने सभी बीएसए को पत्र लिखकर 2023-24 में कम हुए बच्चों की संख्या पर चिंता जताई थी। बच्चों की संख्या 2022-23 में 1.92 करोड़ थी। यह संख्या 2023-24 में घटकर 1.68 करोड़ गई। इस पर कई जिलों में बीएसए ने शिक्षकों को नोटिस भी जारी किया था और अगले सत्र से संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए थे।इस साल अप्रैल से लेकर जुलाई तक बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए कई बार प्रयास किए गए। स्कूल चलो अभियान भी चला लेकिन संख्या बढ़ने के बजाय और कम हो गई है। स्कूल चलो अभियान जुलाई में खत्म हो चुका है। अब तक सरकारी स्कूलों में 1.56 लाख बच्चों के ही दाखिले हो सके हैं। हाल ही में खुद बेसिक शिक्षा मंत्री ने विधान सभा में एक सवाल के जवाब में यह आंकड़ा पेश भी किया था।

anas quraishi
Author: anas quraishi

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