
महामानव गौतम बुद्ध ने अपने तप के बल पर मानव कल्याण हेतु जन्म से निर्वाण तक का सरल मार्ग खोज लिया जिसे उन्होंने मध्यम मार्ग कहा है। मानव के कल्याण हेतु उन्होंने जीवन की सबसे उत्तम स्थिति निर्वाण को बताया है। ज्ञान प्राप्ति के कारण ही वे तथागत बुद्ध कहलाये और मानव कल्याण हेतु उन्होंने बौद्ध धर्म भी चलाया जिसका अनुसरण आज भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान, थाइलैण्ड, तिब्बत, श्री लंका जैसे अनेकों देष बड़ी आत्मीयता के साथ अनुसरण कर रहे हैं। इस धर्म में उन्होंने चार आर्य सत्य बताए जिसको अपनाकर मनुष्य निष्चित रूप से निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।
बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य इस प्रकार हैं- 1- दुख 2- दुख का कारण 3- दुख का निवारण 4- दुख के निवारण की ओर ले जाने वाला मार्ग। अन्तिम विन्दु वाला आर्य सत्य अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है। यह आर्य सत्य प्रज्ञा, शील, समाधि का व्यवहारिक एवं वास्तविक सत्य मार्ग है। इसे आठ भागों में विभाजित किया गया है जो इस प्रकार हैं- 1- सम्यक दृष्टि 2- सम्यक संकल्प 3- सम्यक वाणी 4- सम्यक कर्मान्त 5- सम्यक असजीविका 6- सम्यक व्यायाम 7- सम्यक स्मृति 8- सम्यक समाधि। अष्टांगिक मार्ग पर चलने से दुख का नाष होता है। अविद्या व तृष्णा रहित निर्मल ज्ञान की प्राप्ति के लिए यही एक मार्ग है और कोई मार्ग नहीं।
सत्य की खोज में तथागत बुद्ध सोलह वर्ष की उम्र में एक रात को अपना समस्त राजपाट, सोते हुए परिवार को छोड.कर बियावान जंगल की ओर प्रस्थान कर गए और छः वर्षों तक अनवरत तपस्या की। उन्होंने सुजाता नाम की महिला के हाथों खीर खाने से पहले स्वप्न में वाद्य यन्त्र वीणा को बजाती हुई सखियों को कहते सुना कि ’’इतना मत तानों वीणा के तारों को कि वो टूट जाए। वीणा के तारों को इतना ढीला भी मत करो कि वीणा की सुरीली आवाज ही गुंम हो जाए।’’इसी के बाद उन्होंने अपने कठोर तप का रास्ता त्याग दिया।
इसके बाद उन्हें बैसाख माह की पूर्णिमा को आज से लगभग 2600 सौ वर्ष पूर्व उरूवेला( बुद्ध गया) में बोधि वृक्ष( पीपल) के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्त होने के उपरान्त महामानव गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेष अषाढ. माह की पूर्णिमा को वाराणसी के समीप सारनाथ में देकर अपना धम्म चक्र चलाया। यही धम्म चक्र आगे चलकर बौद्ध धर्म कहलाया। इस प्रकार सारनाथ बौद्ध धर्म की उत्पत्ति की जन्म स्थली भी है जिसके कारण सारनाथ को बौद्ध धर्म में अत्यधिक महत्त्व पूर्ण स्थान माना जाता है।
महामानव गौतम बुद्ध ने मनुष्य को जीवन में उसके कल्याण के लिए हमेषा वैज्ञानिक तरीका अपनाने को कहा जिससे उसको जीने का सुगम रास्ता मिल सके। उन्होंने अपने एक उपदेष में उपासकों को समझाते हुए कहा कि ’किसी की कही हुई, किसी की सुनी हुइ्र्र या किसी की लिखी हुई बात को तब तक मत मानों जब तक कि वह तर्क की कसौटी पर सिद्ध न हो जाए।’ इसके लिए अपनी बुद्धि और विवेक का इस्ते माल करो। पूरे विष्व का विज्ञान इसी तर्क पर आधारित है। तर्क से सिद्ध होकर ही ज्ञान प्राप्त होता है। इसी लिए कहा गया है कि ’जो जागा, वही बुद्ध है।’
राम सेवक वर्मा
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