शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के लिए आखिर कौन है जिम्मेदार
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार शिक्षण व्यवस्था को सुधारने के लिए तमाम प्रयास कर रही है इतना ही नहीं सभी प्रकार के रिसर्च भी परिषदीय स्कूलों पर ही किए जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं लेकिन शिक्षा के बिगड़े हालात में अब तक कोई सार्थक परिवर्तन नहीं आ रहा है

कानपुर देहात। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार शिक्षण व्यवस्था को सुधारने के लिए तमाम प्रयास कर रही है इतना ही नहीं सभी प्रकार के रिसर्च भी परिषदीय स्कूलों पर ही किए जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं लेकिन शिक्षा के बिगड़े हालात में अब तक कोई सार्थक परिवर्तन नहीं आ रहा है। इन स्कूलों में गिर रहे शिक्षा के स्तर के चलते ही अब तक छात्र छात्राओं ने निजी स्कूलों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि जनपद में सरकारी स्कूलों की अपेक्षा निजी स्कूलों में छात्र संख्या बड़ रही है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन गरीब परिवार के बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा जिनके पालक व अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने में असमर्थ हैं।
शिक्षा विभाग के अधिकारी साक्षरता के आंकड़ों की बाजीगरी में ही खुश नजर आ रहे हैं लेकिन इन नेताओं और अधिकारियों को इस बात से कोई मलाल नहीं कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर बद से बदतर क्यों होता जा रहा है। आखिर सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार लाने की जवाबदेही कब तक और कौन लेगा यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
बेसिक शिक्षा जहाँ एक ओर समाज के नजरिये से अपनी छवि धूमिल कर रहा है वहीं बेचारा शिक्षक इस छवि को निरंतर सुधारने मे कोई कोताही नही बरत रहा है व निरंतर सुधार की ओर अग्रसित है, उसके इन्हीं प्रयासों से उसको नित नए नवीन चमत्कार करने पड़ रहे हैं। जिसका उदाहरण अभी वार्षिक परीक्षा के दौरान देखने को मिला है। प्रदेश स्तर से वार्षिक परीक्षा कार्यक्रम जारी किया गया। 27 मार्च को वार्षिक परीक्षा सम्पन्न कराई गई। 28 को एक दिन मे कापियों की जाँच कर परीक्षा फल बच्चों को आवंटन करने हेतु सभी को आदेशित किया गया जबकि उस दिन तक विभाग द्वारा प्रगति पत्र (रिजल्ट कार्ड) उपलब्ध नहीं कराये गए। 29 मार्च को गुड फ्राइडे का अवकाश और 30 को रिजल्ट देना शायद किसी कल्पना के अतिरिक्त कुछ कहा नहीं जा सकता। नया सत्र नई जिम्मेदारी और नये चमत्कार करने की जिम्मेदारी भी बेसिक शिक्षक के मजबूत कंधो पर टिक गयी है जिसमे उसे हरेक वर्ष 20 फीसदी नवीन नामांकन की वृद्धि तो करनी ही है चाहे उस गांव मे उतने बालक हों या न हों।
इसके अतिरिक्त पहली कक्षा मे 6 वर्ष पूर्ण कर चुके बच्चों का नामांकन करना चुनौतीपूर्ण रहेगा क्योंकि यदि किन्हीं कारणों से कोई बालक 6 वर्ष अप्रैल 2024 तक पूर्ण नहीं कर पायेगा तो उसको अगले वर्ष (2025) तक इंतजार करना होगा। ऐसे में क्या वह बालक शिक्षा से दूर नही जायेगा या किसी प्राइवेट संस्था की गोद मे नहीं चला जायेगा। जहाँ से उसे पुन-वापस लाना चमत्कारी होगा। चमत्कार यही समाप्त नहीं होगा क्योंकि आंगनवाड़ी केंद्र जहाँ मात्र बच्चों के नामांकन कागजों पर हैं व धरातल पर मात्र धरातल ही नजर आता है वहां से बच्चों को अपने विद्यालयों में लाना भी चमत्कारी सिद्ध होगा। शायद चुनौतिया यहीं कम नही होंगी क्योंकि परिषदीय विद्यालयों मे नामांकित बालक इसी माह अपने अभिभावकों के साथ गेहूं कटाई मे सहयोग देंगें व विद्यालय से लगभग एक माह दूर हो जायेंगे ऐसे में उनकी विद्यालय मे 90 फीसदी उपस्तिथि दर्शाना यह भी चमत्कार से कम नहीं होगा। इतना ही नहीं शिक्षकों को सैकड़ो प्रकार के गैर शैक्षणिक कार्यों में लगे रहना ही है और शैक्षणिक गुणवत्ता को भी बनाए रखना है।
मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही है कि विभाग द्वारा जितना कार्य शिक्षकों को दिया जाता है क्यों न इतना ही कार्य आदेश जारी करने वालों को मात्र एक माह के लिए ही सौंप दिया जाए और फिर शैक्षणिक गुणवत्ता का आकलन कर लिया जाए पता चल जाएगा कि शैक्षणिक गुणवत्ता खराब करने के लिए शिक्षक दोषी हैं या फरमान जारी करने वाले बड़े साहब। आखिर शिक्षा के गिरते स्तर पर प्रश्न खड़ा होना तो लाजिमी है लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग हैं। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा है न ही सामाजिक चिंतन किया जा रहा है और न ही कोई बड़े स्तर का अधिकारी इस ओर अपना ध्यान आकर्षित कर रहा है बस दोषी सिर्फ शिक्षक को ठहराया जा रहा है जबकि वास्तविकता कुछ और ही है जिसे सभी जानते हुए अंजान बने रहते हैं।
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