संगीत के बिना जीवन अधूराः डॉ. लावण्या
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्याल के संगीत विभाग द्वारा संगीत चिकित्सा विषय पर आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के चौथे दिन गुरुवार को ‘‘ऊँ“ के उच्चारण के महत्व से लेकर वाद्य यंत्रों की मानसिक स्थिति पर प्रभाव को लेकर चर्चा की गई।

- शुक्रवार को संगीत थिरैपी विषय पर एफडीपी का समापन सत्र
कानपुर,अमन यात्रा । छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्याल के संगीत विभाग द्वारा संगीत चिकित्सा विषय पर आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के चौथे दिन गुरुवार को ‘‘ऊँ“ के उच्चारण के महत्व से लेकर वाद्य यंत्रों की मानसिक स्थिति पर प्रभाव को लेकर चर्चा की गई। संयोजिका डॉ. ऋचा मिश्रा ने बताया कि शुक्रवार को एफडीपी का अंतिम दिन होगा, इसमें पहले के दो सत्रों में संगीत थिरैपी से संबंधित व्याख्यान होंगे। तीसरे सत्र में क्विज का आयोजन किया जायेगा। अंतिम एवं समापन सत्र सायं चार बजे से आयोजित होगा, जिसमें ख्याति प्राप्त संगीतज्ञ भी उपस्थित रहेंगे।
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मुंबई की संगीत चिकित्सक डॉ. रुचि श्रीवास्तव ने बताया कि ‘‘ऊँ“ के उच्चारण से हमें शारीरिक तथा मानसिक लाभ प्राप्त होता है। इससे हमारे फेफड़े तो मजबूत होते ही है, साथ ही बेचैनी और अनिद्रा जैसी बिमारियों में भी यह असरदार दवा के रूप में कार्य करता है। ‘‘ऊँ“ का उच्चारण सुखासन, पद्मासन और व्रजासन में बैठकर करने से पूरे शरीर को अत्यंत फायदा होता है।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) के संगीत एवं नाट्य विभाग की पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. लावण्या कीर्ति सिंह (काव्या) ने कहा है कि संगीत को समझने की क्षमता बचपन से ही विकसित हो जाती है और उम्र के साथ और बढ़ती जाती है, इसलिए संगीत को भावनाओं की अनुकूलताओं के आधार पर चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। वाद्य यंत्रों से निकलने वाली ध्वनि जब हमारे कानों में पहुंचती है तो उससे मन में सुख तथा शांति की अनुभूति होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को गाते समय परम आनंद का एहसास होता है।
उन्होंने कहा कि संगीत के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। संगीत को सुनने से हमारे शरीर में जो तरंगे उत्पन्न होती है, उससे मन प्रफुल्लित हो उठता है। इतना ही नही, कोरोना काल में भी संगीत मानसिक अवसाद में चिकित्सा के रूप में सहायक रहा है।
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