
एक कहावत है—’जमातो (दामाद) दशम ग्रह।Ó वैसे तो नौ ग्रह ही होते हैं, लेकिन व्यंग्यकारों और कहावत कहने वालों ने दामाद को दसवां ग्रह नाम दे दिया। सुना है कि इन दिनों महाराष्ट्र के नेताओं के दामाद उनके जी का जंजाल बने हुए हैं। दुनिया में लगभग सभी चीजें ऐसी हैं, जिनका कभी न कभी ह्रास होता ही है, लेकिन दुनिया में ‘जमाईÓ नाम की जाति ऐसी है, जिसका ससुराल में कभी ह्रास या अवमूल्यन नहीं होता। वह पहले दिन से उसके जिंदा रहने तक ‘जमाई राजाÓ ही रहता है। इसलिए लोग कहते हैं कि बनना ही है तो ‘जमाई राजाÓ बनो।
आप ‘पतिÓ बनते ही ससुराल वालों के ‘दामादÓ बन जाते हैं। यदि आप किसी कार्यालय या शॉप में चपरासी हो तो भी आप अपने ससुराल में ‘जमाई राजाÓ ही कहलाएंगे। वहां आपकी प्रतिष्ठा को कोई ठेस नहीं पहुंचा सकता। हमारा एक मित्र था, जो हमारे साथ मेडिकल कॉलेज में पढ़ता था। एक बार परीक्षा में नकल करते समय हमारे डीन ने उसे पकड़ कर एक साल के लिए परीक्षा देने से निलंबित कर दिया। परिणामत: उसने पढ़ाई छोड़ी और एक करोड़पति परिवार की इकलौती लड़की से शादी कर ली और ‘दामादÓ बनकर उड़ाने लगा।
नसीब देखिए कि उसके ससुराल वालों ने जुगाड़ कर उसे एक राष्ट्रीय पार्टी का टिकट दिलाकर विधानसभा चुनाव में खड़ा करवा दिया और पानी की तरह पैसा बहाकर उसे जितवा भी दिया। विधायक बनते ही उसने हाईकमान से जुगत लगाई और मंत्रिमंडल में स्थान प्राप्त कर मंत्री बन गया। जब मैं एमबीबीएस की अंतिम परीक्षा दे रहा था, तब हमारे कॉलेज के वार्षिक समारोह के मुख्य अतिथि के तौर पर उसे ही आमंत्रित किया गया। उसने अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि मित्रों, मैं इस मेडिकल कॉलेज का ही एक भूतपूर्व छात्र हूं। भाग्य से मैं डॉक्टर न बन सका, लेकिन मैं अपने कॉलेज के डीन साहब का हृदय से आभारी हूं, जिनके कारण मैं आज प्रदेश का ‘स्वास्थ्य मंत्रीÓ बन सका। मैं अपने ससुरजी का भी हृदय से आभारी हूं, जिन्होंने मुझे अपना दामाद बनाया और राजनीति के अखाड़े में उतारा। मुझे मंत्री बनने पर उतनी ही खुशी मिली, जितनी कि शादी के बाद ‘दामादÓ बनने पर मिली थी।Ó
आज के दामाद बहुत चतुर हैं। वे जानते हैं कि ससुराल में कितने दिन रहना चाहिए। साथ ही वे ये भी जानते हैं कि दामाद हो या कोई पाहुना (मेहमान), किसी दूसरे के घर में पहले दिन पाहुना और उसके बाद के दिनों में उसकी कीमत झाड़ू में अटके कचरे के समान होती है। इसलिए दामाद लोग दो दिन बाद ही तत्काल अपने सास-ससुर के पैर पड़कर पांच सौ या हजार रुपये लेकर विदाई ले लेते हैं। फिर एक सत्य यह भी है कि दुनियाभर के दामादों के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में चींटी बराबर की भी कमी नहीं आई है। फिर आए भी भला कैसे? यदि उसे दसवां ग्रह माना है तो सम्मान तो देना ही पड़ेगा न?
विलास जोशी
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