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समायोजन 3.1 की सूची को हाईकोर्ट ने किया खारिज

अपर मुख्य सचिव का आपातकालीन फरमान जारी

राजेश कटियार, लखनऊ/कानपुर देहात। उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षकों के भविष्य से जुड़े समायोजन 3.1 प्रकरण में शुक्रवार को एक बेहद नाटकीय और महत्वपूर्ण मोड़ आ गया। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई समायोजन पदों की सूची को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी के तुरंत बाद बेसिक शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारियों में हड़कंप मच गया है और अपर मुख्य सचिव ने आनन-फानन में एक आपातकालीन पत्र जारी कर उसी दिन नया डेटा तलब किया।

शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में न्यायमूर्ति एस. डी. सिंह की अध्यक्षता में इस बहुप्रतीक्षित मामले की सुनवाई शुरू हुई। लंच से ठीक पहले जब कोर्ट की कार्यवाही बैठी तो सरकारी वकीलों ने कोर्ट के सामने समायोजन पदों का पूरा डेटा प्रस्तुत किया। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि शायद आज इस मामले पर कोई अंतिम फैसला आ जाएगा लेकिन लंच के बाद जैसे ही अदालत की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई पासा पूरी तरह पलट गया। माननीय न्यायालय ने सरकार द्वारा पेश की गई सूची का बारीकी से अध्ययन करने के बाद उसे स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

न्यायालय ने किन विसंगतियों पर जताई कड़ी आपत्ति-

अदालत ने सरकारी सूची को खारिज करते हुए बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस डेटा में अभी भी कई गंभीर तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियां (विसंगतियां) मौजूद हैं।

एनआईसी पोर्टल पर डेटा का अभाव- न्यायालय ने पाया कि प्रदेश के कई जिलों का समायोजन संबंधी डेटा अभी तक एनआईसी पोर्टल पर अपलोड ही नहीं किया गया है। बिना पूर्ण डेटा के प्रक्रिया को आगे बढ़ाना सही नहीं है।

फिफो नियम की अनदेखी-

कोर्ट का सबसे सख्त रुख फिफो (First In First Out) प्रक्रिया को लेकर था। न्यायालय ने साफ कहा कि सरकार ने समायोजन के लिए तय इस अनिवार्य नियम का सही ढंग से पालन नहीं किया है। कुछ जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों ने आरटीई एक्ट का पालन नहीं किया और जिस कारण से प्रधानाध्यापक सरप्लस सूची से छूट गए और दूसरे सहायक शिक्षक को सरप्लस कर दिया।

आंकड़ों में स्पष्टता की कमी-

प्रस्तुत किए गए आंकड़ों में कई जगह विरोधाभास था जिसे सुधारने और अधिक स्पष्ट करने की सख्त जरूरत दिखी। इन तमाम खामियों के कारण माननीय न्यायालय ने वर्तमान सूची को रिजेक्ट कर दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए आगामी 6 जुलाई सोमवार का दिन मुकर्रर कर दिया है।

कोर्ट की फटकार के बाद शासन सख्त-

इधर जैसे ही हाईकोर्ट ने सूची खारिज की उधर लखनऊ में शासन स्तर पर हलचल तेज हो गई। कोर्ट की टिप्पणी के तुरंत बाद अपर मुख्य सचिव, बेसिक शिक्षा ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा पत्र जारी कर दिया है। इस पत्र के जरिए विभाग के अधिकारियों को उसी दिन तत्काल श्रेणीवार डेटा उपलब्ध कराने का अल्टीमेटम दिया गया। शासन ने विशेष रूप से निम्नलिखित तीन सूचियों को शाम तक हर हाल में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

सरप्लस विद्यालयों की सूची-

वे स्कूल जहां तय मानक से अधिक शिक्षक तैनात हैं। आवश्यकता से अधिक तैनात शिक्षकों का पूरा ब्योरा। वे स्कूल जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और जहाँ तुरंत शिक्षकों की आवश्यकता है।

माना जा रहा है कि सरकार सोमवार को होने वाली अगली सुनवाई से पहले एक फुलप्रूफ और त्रुटिहीन डेटा तैयार कर कोर्ट के सामने पेश करना चाहती है ताकि कोर्ट की नाराजगी से बचा जा सके। कानपुर देहात बेसिक शिक्षा अधिकारी आशीष कुमार पाण्डेय ने बताया कि हमारे जनपद की सूची पूर्णतया सही और आरटीई एक्ट के अनुरूप थी अन्य जनपदों की सूचियों में कुछ विसंगतियां रहीं होंगी जिस वजह से पुन: सूची प्रेषित करने के निर्देश दिए गए हैं।

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