
शिक्षा केवल बच्चों को उत्तर रटाने या परीक्षा उत्तीर्ण कराने का साधन नहीं है बल्कि उन्हें सही और गलत में भेद करने, प्रश्न पूछने, तर्क करने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने में सक्षम बनाने की एक प्रक्रिया है। यह लोकतांत्रिक चेतना बच्चों में पुस्तकों से अधिक शिक्षक के स्वयं के आचरण और व्यवहार से विकसित होती है। यदि शिक्षक स्वयं स्वतंत्र, विवेकशील और सत्य बोलने का साहस रखने वाला व्यक्ति है तभी वह बच्चों में भी इन मूल्यों का सिंचन कर सकता है।
जिस विद्यालय और स्टाफ रूम में असहमति को स्वीकार करने के बजाय केवल अंध-अनुपालन की संस्कृति होती है वहाँ बच्चों से आलोचनात्मक चिंतन की अपेक्षा करना व्यर्थ है। शिक्षक का बोलना या असहमति व्यक्त करना किसी पद या व्यवस्था के विरोध के लिए नहीं बल्कि सुधार और बच्चों के हित में भागीदारी के लिए आवश्यक है हालाँकि यह आवाज आक्रोश या व्यक्तिगत आरोपों पर आधारित न होकर तर्क, तथ्य, विवेक और मर्यादा के साथ समाधान की दिशा में होनी चाहिए। शिक्षक का यह संतुलित साहस ही विद्यालय को एक ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है जहाँ बाल अधिकारों की रक्षा होती है और बच्चों में भयमुक्त होकर बोलने का आत्मविश्वास जागता है। इसके साथ ही नीति-निर्माताओं के लिए भी शिक्षक केवल किसी योजना का क्रियान्वयनकर्ता नहीं होना चाहिए बल्कि उसकी व्यावहारिक समझ और कक्षा के अनुभवों को नीति-निर्माण का ज्ञान-स्रोत माना जाना चाहिए।
आज के डिजिटल और एआई के युग में जब बच्चे सूचनाओं के महासमुद्र से घिरे हैं शिक्षक की भूमिका केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं रह गई है। उसकी असली शक्ति बच्चों को सही और गलत सूचना परखने की दृष्टि देने, बहुमत और सत्य का अंतर समझाने तथा अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों का बोध कराने में है। अंततः बच्चों में साहस, लोकतंत्र, विवेक और सत्य का मूल्य विकसित करने का सबसे प्रभावी मार्ग भाषण देना नहीं बल्कि शिक्षक द्वारा स्वयं विषम परिस्थितियों में भी इन आदर्शों को जीकर उनका उदाहरण प्रस्तुत करना है।
राजेश कटियार, कानपुर



