जीवन में निरंतरता ही सार्थक है
मनुष्य के जीवन में लगन और विश्वास के साथ किए गए कार्यों से या तो जीत मिलती है या हार I

मनुष्य के जीवन में लगन और विश्वास के साथ किए गए कार्यों से या तो जीत मिलती है या हार I परंतु मनुष्य को न तो जीत मिलने पर अधिक खुश होना चाहिए और न ही हार मिलने पर निराश I बल्कि अपने कार्यों के प्रति समर्पित रहना चाहिए I जीत और हार या कहें सफलता और असफलता कर्म के दो पहलू हैं जिसमें एक का मिलना सुनिश्चित है l जो मैदान में उतरेगा उसे इन दोनों में से एक स्वीकार करना होगा l जो नहीं उतरेगा उसे कुछ भी नहीं मिलेगा I इसलिए जीवन के संघर्ष रूपी प्रतियोगिता का सामना अवश्य करना चाहिए वरना जीवन निरर्थक हैl
किंतु जो व्यक्ति केवल सफलता के क्षणों में ही सक्रिय रहता है, वह लंबे समय तक मैदान में टिक नहीं पाता। वास्तविक शक्ति निरंतरता में निहित होती है। निरंतर प्रयास व्यक्ति को अनुशासन सिखाता है, धैर्य देता है और लक्ष्य के प्रति सजग बनाए रखता है। मैदान चाहे शिक्षा का हो, साहित्य का, खेल का या जीवन संघर्ष का—नियमित अभ्यास और सतत परिश्रम ही पहचान बनाते हैं। सफलता क्षणिक हो सकती है, पर निरंतरता चरित्र का निर्माण करती है।
जो व्यक्ति हर दिन थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ने का संकल्प रखता है, वही अंततः स्थायी सफलता प्राप्त करता है। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, पर निरंतर कर्मशील रहना व्यक्ति को समय की कसौटी पर खरा उतारता है। इसलिए सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है निरंतरता, क्योंकि वही जीवन की वास्तविक जीत सुनिश्चित करती है। जो निरन्तर कार्यरत होगा वह सफल भी जरूर होगा।
रामसेवक वर्मा
विवेकानंद नगर पुखरायां कानपुर देहात उत्तर प्रदेश



