नववर्ष के स्वागत की अनोखी परंपरा: कोलंबिया की ‘ला मालेता’
ला मालेता का शाब्दिक अर्थ ‘सूटकेस’ है।
संसार के हर कोने में नववर्ष के स्वागत की अपनी-अपनी रंगत है; कहीं रोशनी से आकाश जगमगा उठता है, कहीं परंपरागत व्यंजनों की खुशबू घर-आँगन भर देती है, तो कहीं सांकेतिक रस्मों के ज़रिये आने वाले समय के लिए शुभकामनाएँ गढ़ी जाती हैं। इन्हीं के बीच लैटिन अमेरिका के देश कोलंबिया में नववर्ष मनाने की एक अनोखी और अर्थपूर्ण परंपरा है—ला मालेता।
ला मालेता का शाब्दिक अर्थ ‘सूटकेस’ है। कई स्थानों में इस परम्परा को ‘कोरेर कॉन ला मालेता’ अर्थात सूटकेस के साथ दौड़ना भी कहा जाता है। इस रस्म में 31 दिसंबर की रात या नए साल के शुरुआती क्षणों में लोग एक खाली सूटकेस हाथ में लेकर अपने घर की दहलीज़ को लांघते हैं। वे अपनी गली, मोहल्ले या पूरे पड़ोस का चक्कर लगाते हैं और कई बार प्रतीकात्मक रूप से हवाई अड्डे की दिशा में भी चल पड़ते हैं। वहाँ यह मान्यता है कि नए साल की पहली क्रिया पूरे वर्ष की दिशा तय करती है। इसी सोच के तहत खाली सूटकेस लेकर चलना आने वाले वर्ष को ‘गतिशील’ बनाने का प्रतीक बन गया। यह यात्राओं और नए अवसरों को आमंत्रण देने का संकेत है। यह विश्वास तर्क से अधिक सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक स्मृति पर आधारित है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। खाली सूटकेस लेकर चलने का सामूहिक दृश्य जितना मज़ेदार और उत्सवपूर्ण लगता है, उसके पीछे छिपा भाव उतना ही गहरा और मानवीय है।
‘ला मालेता’ का मूल भाव आने वाले वर्ष में अधिक यात्राएँ करने की कामना से जुड़ा है। यहाँ यात्रा केवल भौगोलिक बदलाव नहीं, बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विस्तार का प्रतीक है। खाली सूटकेस दरअसल खालीपन नहीं दर्शाता, बल्कि संभावनाओं से भरे भविष्य का संकेत देता है। यह उस जगह का प्रतीक है, जिसे आने वाला साल नए अनुभवों, मुलाक़ातों और स्मृतियों से भर सकता है। इस तरह यह रस्म मनुष्य की उस स्वाभाविक आकांक्षा को अभिव्यक्त करती है, जो उसे ज्ञात सीमाओं से आगे देखने के लिए प्रेरित करती है।
आधुनिक संदर्भ में इस परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता है। जब बँधी-बँधाई दिनचर्या, काम का दबाव, मशीनीकृत जीवन और सीमित समय ने ठहराव और यात्राओं को मुश्किल बना दिया है। ऐसे में खाली सूटकेस लेकर चलना केवल घूमने की इच्छा नहीं, बल्कि जड़ता से बाहर निकलने की आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल एक ही जगह टिके रहने का नाम नहीं, बल्कि यह निरंतर नए अनुभवों से स्वयं को विस्तार देने की प्रक्रिया है।
ला मालेता की सबसे रोचक विशेषता इसकी सामूहिकता है। इसमें उम्र, वर्ग या आर्थिक स्थिति की कोई सीमा नहीं होती है। बच्चे, युवा, बुज़ुर्ग सभी हँसी-मज़ाक के साथ इसमें शामिल होते हैं। कई परिवार इसे एक खेल की तरह एंजॉय करते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं और पूरा माहौल उल्लास से भर जाता है। इस तरह यह व्यक्तिगत इच्छा से आगे बढ़कर सामुदायिक उत्सव का रूप ले लेता है, जहाँ सपने अकेले नहीं, बल्कि मिलकर देखे जाते हैं।
ये परम्परा आधुनिक जीवन की एक सूक्ष्म आलोचना भी करती है। आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में सफलता को अक्सर आय, स्थिरता, संपत्ति संचय और निरंतर उत्पादकता से जोड़ा जाता है। इसके विपरीत, खाली सूटकेस इस बात की ओर संकेत करता है कि जीवन का सार सिर्फ संचय में नहीं, बल्कि उन पलों में भी है जो हमें भीतर से समृद्ध करते हैं। यात्राएँ हमें अलग-अलग संस्कृतियों, भाषाओं और जीवन-दृष्टियों से परिचित कराती हैं और हमारी संवेदनशीलता को अधिक मानवीय बनाती हैं।
यात्राएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं होतीं, बल्कि वे अपने समय और अपने आप किया गया एक गहन संवाद होती हैं। ये हमें ठहरकर खुद को समझने का अवसर देती हैं, जकड़े हुए विचारों से मुक्त होकर नई दिशा में बहने की छूट देती हैं। हर नए रास्ते, हर नई जगह और हर नई हवा में कुछ खास होता है। इससे केवल दृश्य नहीं बदलते, बल्कि सोच और अनुभव को भी नई दिशा मिलती है। यानी यात्राएँ हमें सीमित कुएँ से बाहर निकालकर जीवन को खुले आकाश की तरह महसूस कराती हैं, जहाँ हम खुद को नए सिरे से खोज पाते हैं। सही मायनों में नई जगहों की सैर भीतर की यात्रा का बाहरी बहाना होती है। राहुल सांकृत्यायन ने अपने निबंध “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” के हवाले से यात्राओं को आत्म-विस्तार का साधन बताया है। कहते हैं कि यात्रा से बड़ा कोई विश्वविद्यालय नहीं और रास्तों से बड़ी कोई पाठशाला नहीं। नए इलाकों की भाषाएँ, जीवन संघर्ष, पोशाक और खानपान हमें सिखाते हैं कि दुनिया को एक ही नज़रिए से देखना अन्याय है। ये यात्राएँ हमें ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती हैं और हमें दुनिया का नागरिक बनाती हैं।
यात्राएँ केवल वर्तमान का अनुभव नहीं देतीं, बल्कि स्मृतियों का अनमोल ख़ज़ाना भी बन जाती हैं। जीवन के ठहरे क्षणों में यही यादें हमें मुस्कुराने का कारण देती हैं। साथ ही अनेक शोधों से साबित है कि ये हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं। नियत दिनचर्या से इतर बिताए गए कुछ पल तनाव घटाते हैं, ऊर्जा बढ़ाते हैं और जीवन में संतुलन लौटाते हैं। इस प्रकार यात्राएँ बिना दवा के मन और शरीर दोनों का उपचार हैं।
इस मायने में कोलंबिया की ला मालेता परंपरा एक जीवन-दृष्टि है। खाली सूटकेस लेकर उठाया गया हर क़दम इस विश्वास का प्रतीक है कि भविष्य अभी लिखा जाना बाकी है। हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी अपने जीवन में कुछ जगह खाली छोड़ पा रहे हैं, ताकि नया साल उसे नए अनुभवों, यात्राओं और संभावनाओं से भर सके। ये दुनिया बेहद हसीन है, इसका हर कण, हर दिशा, हर जगह, हर हवा का कतरा जादुई है। क्यों न जीवन के बड़े उद्देश्यों में एक यह भी हो कि इस दुनिया का एक भी कोना इस जीवन में इन आँखों से अछूता न रह जाए। सही अर्थों में जीवन की पूर्णतः तभी है जब हम इस उद्देश्य को भी पूरा कर पाएं। ला मालेता हमें याद दिलाती है कि भरे हुए हाथ अक्सर कुछ नया नहीं थाम पाते, लेकिन कुछ गुंजाइश और उत्साहित मन खाली सूटकेस में पूरी दुनिया समेट लेने की क्षमता रखता है। यही इस परम्परा की असली सुंदरता है और यही जीवन का सबसे सुंदर सबक।
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मोहम्मद ज़ुबैर



