परिवारवाद की राजनीति पर जवाबी हमला: बलिदानवाद का संकल्प और महाकाव्यों का अपमान
राजनीति में परिवार की भूमिका: महागाथाओं से लेकर वर्तमान संघर्ष तक

- परिवार और राजनीति पर 'तानाजीवी मीडिया हाउस' का दोहरा मापदंड
आज देश में कुछ मीडिया हाउस हमारे महाकाव्यों की बातों और संदर्भों को गलत तरीके से प्रस्तुत करके उनका अपमान कर रहे हैं और इन महाकाव्यों को माननेवालों की धार्मिक भावनाओं को आहत भी कर रहे हैं। ये राजनीतिक ‘दानाजीवी मीडिया हाउस’ बार-बार परिवारवाद के नाम पर जो एजेंडा चला रहे हैं, क्या वे यह नहीं जानते हैं कि हमारे दोनों महाकाव्यों के पीछे की सांकेतिक महाकथा का आधार परिवार रहा है। दरअसल, सत्ता-भक्ति में लीन ये लोग जाने-अनजाने में ‘परिवार’ के नाम पर हमारी पौराणिक महागाथाओं का मखौल उड़ा रहे हैं और उनकी प्रतीकात्मक कहानियों को बदनाम कर रहे हैं। ऐसी बातों से परिवार कमज़ोर होते हैं और महाकाव्यों का अपमान होता है। सच तो यह है कि ये जिन स्वार्थी लोगों के लिए काम कर रहे हैं, वे स्वयं परिवार और संबंधों को कोई महत्व नहीं देते हैं। ये मीडिया हाउस उनके परिवारों की कहानियाँ छापने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते हैं? उनके उपेक्षित छोड़ दिये गये घरवालों के बारे में समाचार प्रकाशित क्यों नहीं करते हैं?
परिवारवाद नहीं, यह बलिदानवाद है
जो लोग राजनीति को पैसा कमाने की मशीन समझते हैं, उनके मन के अंदर चोर बैठा होता है, इसीलिए वे राजनीति को खराब मानकर अपने परिवार को राजनीति में सामने से नहीं, पिछले दरवाज़े से लेकर आते हैं। जो लोग राजनीति के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं और उसे जन सेवा का माध्यम मानते हैं, वे ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की भलाई के लक्ष्य से प्रेरित होकर अपने परिवार को संघर्ष के लिए समर्पित कर देते हैं। यह परिवारवाद नहीं, बलिदानवाद होता है क्योंकि उनके परिवारवालों को भी अहंकारी सत्ताओं और वर्चस्ववादी लोगों से लड़ना पड़ता है, हर तकलीफ़ का सामना करना पड़ता है। जबकि इसके विपरीत, सुविधाभोगी लोग अपने परिवार को ऐशो-आराम के कामों में लगाकर, उनके ज़रिए अपने लिए जायदाद-दौलत इकट्ठा करने में लग जाते हैं।
परिवारवाद विरोधियों के लिए सात निर्णायक चुनौतियाँ
अगर परिवार इतना ही बुरा है तो भाजपाई और उनके अपरिवारवादी संगी-साथी व दानाजीवी मीडिया हाउस घोषित कर दें कि:
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वे आज ही उन सब लोगों को अपनी पार्टी और संगठन से निकाल देंगे, जिनके माता-पिता या परिवार का अन्य कोई सदस्य कभी भी राजनीति में रहा है।
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उन सभी को छोटे पद से लेकर मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद तक से हटा देंगे, जिनकी मठाधीशी का आधार पारिवारिक संबंध है।
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ये उनसे चंदा नहीं लेंगे जिनके कारोबार में परिवार लगा है।
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नाम के बाद आनेवाले पारिवारिक नाम (सरनेम) का प्रयोग बंद कर देंगे।
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जिनके भी परिवार हैं उनसे वोट नहीं लेंगे।
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सरकार यह नियम बना दे कि अधिकारी की बेटी या बेटा अधिकारी नहीं बनेगा; डॉक्टर का, डॉक्टर नहीं बनेगा; वकील और न्यायाधीश का एडवोकेट या जज नहीं बनेगा; पत्रकार का जर्नलिस्ट नहीं बनेगा; कारोबारी का कारोबारी नहीं बनेगा; और मीडिया हाउस के मालिक की बच्ची या बच्चा मीडिया हाउस का मालिक नहीं बनेगा… इत्यादि।
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दानाजीवी मीडिया हाउस भी घोषित करें कि अपने परिवार के लोगों से मैनेजमेंट के सारे पद और शेयर वापस ले लेंगे और अपने एम्प्लॉयीज़ को दे देंगे। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके विरुद्ध भी शांतिपूर्ण जन आंदोलन करने का हक़ उनके एम्प्लॉयीज़ और जनता को होगा।
परिवार को तोड़ने की साजिश: शोषण और उपभोक्तावाद का आधार
सच्चाई तो यह है कि भाजपा और उनके अपरिवारवादी संगी-साथी चाहते है कि परिवार तोड़ दिये जाएं, लोगों को अकेला कर दिया जाए, फिर उनको डराकर अपने प्रभाव में लेकर उनका शोषण किया जाए। भुखमरी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भर्ती-नौकरी, खेती-मजदूरी, काम-कारोबार, तंगी-मंदी जैसे मुद्दों पर लोग इकट्ठा न हो पाएं। ये सब नकारात्मक स्वार्थी लोग एकजुटता से डरते हैं, और चूँकि परिवार एकजुटता की पहली सीढ़ी होते हैं, इसीलिए परिवार को नकारते हैं। परिवार, कुनबा, कुल जब सकारात्मक होकर एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तभी समाज बनता है। सच्चा समाज नकारात्मक लोगों के खिलाफ होता है, इसीलिए जब कोई चोर-डकैत गाँव-बस्ती में घुस आता है तो यह सारा समाज इकट्ठा होकर, एक होकर उसको खदेड़ देता है। भाजपाई और उनके संगी-साथी अंदर से डरे हुए लोग हैं, इसीलिए परिवार की बुराई करते हैं। इनका बस चले तो कल को ये शादी-विवाह भी बंद करवा दें, जिससे कि परिवार बने ही नहीं, यहाँ तक कि पारिवारिक एकजुटता की तस्वीरों को भी बैन कर दें।
कुछ स्वार्थी मीडिया हाउस भी चाहते हैं कि परिवार टूट जाएं और लोग अकेले पड़ जाएं जिससे अकेले लोग अलग-अलग घरों में रहें और उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिले, हर किसी का अपना टीवी, फ्रिज और बाकी सामान हो, जिसकी बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियाँ अपना विज्ञापन करें और इनको विज्ञापन के लिए पैसे देकर, इनका खज़ाना भरें। ये मीडिया हाउस बताएँ कि ‘प्रायोजित समाचार, फेक न्यूज़, एजेंडा-प्रोग्राम चलाने की दानापोषी व विज्ञापनों से कमायी गई अपनी अरबों की कमाई में से इन्होंने कितना परिवार को दिया और कितना अपने एम्प्लॉयीज़ को।’
दिवंगतों के प्रति सम्मान की सांस्कृतिक परंपरा
इन मीडिया हाउस और उनके पोषकों के अंदर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिए कि जो लोग अब दुनिया में नहीं हैं उनको सम्मान के साथ प्रदर्शित करें। दिवंगतों के प्रति सम्मान की भावना रखना हमारी सांस्कृतिक परंपरा रही है। इन जैसे धनलोभी मीडिया हाउसों से पत्रकारिता के मान, मूल्य, मर्यादा और सैद्धांतिक सीमाओं की अपेक्षा करना तो व्यर्थ है, लेकिन अपने देश की सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता की रत्ती भर उम्मीद तो की जा सकती है, या इनमें इतनी भी नैतिकता नहीं बची कि कम-से-कम गुज़रे हुए लोगों को तो अपनी खुदगर्ज़ी का शिकार न बनाएँ। सम्मान नहीं कर सकते तो अपमान भी न करें। क्या इस अपमान का आधार यह है कि ऐसे लोग शोषित-वंचित समाज से आते हैं?
अब पीडीए नहीं सहेगा, खुलकर कहेगा।
हर परिवारवाले के दुख, दर्द, तकलीफ़ को अपना माननेवाला… हर परिवार की तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और परिवारों से मिलकर बननेवाले समाज में अमन-चैन चाहनेवाला…
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अखिलेश यादव सपा प्रमुख



