
राजेश कटियार, कानपुर देहात। विद्यालय का प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक मिलनसार दिखने के दबाव में यदि अपनी निर्णय क्षमता खो देता है तो वह धीरे-धीरे नेतृत्व नहीं बल्कि प्रभावों का शिकार बन जाता है।
यह बात कड़वी जरूर है लेकिन सच यही है कि एक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक का काम सभी को खुश रखना नहीं बल्कि सही और न्यायपूर्ण निर्णय लेना है और यह निर्णय मित्रता, दबाव या अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्य, प्रमाण और विवेक के आधार पर ही संभव है।
यह धारणा कि प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक को हर समय मित्रवत होना चाहिए शिक्षा के पेशेवर ढाँचे को कमजोर करती है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के बीच संबंध सम्मान और स्पष्टता का होना चाहिए न कि अनावश्यक घुलने-मिलने का।
अत्यधिक मित्रता कई बार निर्णयों की निष्पक्षता को प्रभावित करती है जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ती है बल्कि कार्यसंस्कृति भी प्रभावित होती है इसलिए प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक का सख्त होना कोई नकारात्मक गुण नहीं बल्कि एक आवश्यक पेशेवर विशेषता है बशर्ते उसमें संवेदनशीलता और न्याय का संतुलन भी मौजूद हो। निर्णय प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वह कितनी प्रमाण आधारित है।
विद्यालय में हर दिन अनेक शिकायतें, सुझाव और आरोप आते रहते हैं। यदि प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक हर बात को सुनकर तुरंत प्रतिक्रिया देने लगे तो वह कान का कच्चा कहलाएगा। एक सशक्त प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक वही होता है जो हर सूचना को अंतिम सत्य नहीं मानता बल्कि उसकी सत्यता की जांच करता है।
वह सुनता है लेकिन तुरंत विश्वास नहीं करता, वह देखता है पर बिना जांच के निर्णय नहीं करता। यहीं पर सत्यापन और जांच की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। एक पेशेवर प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक के लिए यह अनिवार्य है कि वह किसी भी निर्णय से पहले तथ्य इकट्ठा करे, संबंधित पक्षों को सुने और फिर संतुलित निष्कर्ष तक पहुँचे।
जो प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक बिना जांच के निर्णय लेता है वह अनजाने में अन्याय कर बैठता है और उसका यह अन्याय पूरे विद्यालय में अविश्वास का वातावरण पैदा कर देता है। आज के समय में विद्यालयों में डेटा का महत्व भी बढ़ गया है। छात्र की उपस्थिति, परिणाम, व्यवहार, शिक्षक का प्रदर्शन इन सबका रिकॉर्ड मौजूद होता है।
ऐसे में निर्णय केवल किसने क्या कहा पर नहीं बल्कि क्या प्रमाण उपलब्ध हैं इस पर आधारित होना चाहिए। यही दृष्टिकोण प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक को भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से निकालकर पेशेवर मजबूती देता है लेकिन यहाँ एक और खतरा भी है केवल आंकड़ों पर आधारित होकर मानवीय पक्ष को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना। एक अच्छा प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक आंकड़ों को समझता है लेकिन उनके पीछे छिपी परिस्थितियों को भी पढ़ता है।
वह यह जानता है कि हर आंकड़ा एक कहानी कहता है और हर कहानी के पीछे एक इंसान होता है। अंततः एक प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक की असली पहचान उसके निर्णयों से होती है। वह कितना निष्पक्ष है, कितना प्रमाण आधारित है और कितना स्वतंत्र है यही उसकी विश्वसनीयता तय करता है, जो प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक सुनी-सुनाई बातों पर चलता है वह कभी स्थिर नेतृत्व नहीं दे सकता लेकिन जो तथ्य, जांच और संतुलन के आधार पर निर्णय लेता है वही विद्यालय में एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करता है जहाँ न केवल अनुशासन होता है बल्कि न्याय का विश्वास भी कायम रहता है।



