बिग ब्रेकिंग: 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को मिल सकती है टीईटी से राहत
सरकार का कहना है कि पुराने शिक्षकों पर नई व्यवस्था को लागू करना कानूनी और व्यवहारिक दोनों ही दृष्टियों से उचित नहीं है।

राजेश कटियार, कानपुर देहात। देशभर में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) को लेकर चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुकी है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है उन्हें दो वर्षों के भीतर टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा। इस आदेश के बाद तमिलनाडु सरकार ने अदालत में पुनर्विचार याचिका दाखिल करते हुए 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी लागू करने पर आपत्ति जताई है। सरकार का कहना है कि पुराने शिक्षकों पर नई व्यवस्था को लागू करना कानूनी और व्यवहारिक दोनों ही दृष्टियों से उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तमिलनाडु सरकार ने उठाए सवाल
1 सितंबर 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि में पांच वर्ष से अधिक समय बाकी है, वे सभी दो साल के भीतर टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करें। इस आदेश में पुराने और नए दोनों ही शिक्षकों को शामिल किया गया था। तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर यह नियम लागू नहीं होना चाहिए क्योंकि उनकी नियुक्ति उस समय के प्रावधानों के अनुसार वैध रूप से की गई थी। सरकार ने याचिका में बताया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) की धारा 23(1) केवल भविष्य की नियुक्तियों से संबंधित है। वहीं धारा 23(2) के अंतर्गत केंद्र सरकार को प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी को देखते हुए अस्थायी छूट देने का अधिकार दिया गया है। ऐसे में 5 साल के भीतर योग्यता हासिल करने की शर्त उन्हीं पर लागू की जानी चाहिए जिन्हें छूट की अवधि में नियुक्त किया गया था, न कि उन पर जिनकी नियुक्ति पहले ही वैधानिक रूप से हो चुकी है।
न्यायालय के आदेश से शिक्षा व्यवस्था पर गहरा असर संभव
राज्य सरकार ने अपनी पुनर्विचार याचिका में बताया कि फिलहाल तमिलनाडु में 449850 सरकारी शिक्षक कार्यरत हैं। इनमें से 390458 शिक्षकों ने अब तक टीईटी परीक्षा पास नहीं की है। यदि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पुराने शिक्षकों पर भी लागू किया गया तो लाखों शिक्षकों की सेवाएं खतरे में पड़ सकती हैं। इससे लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित होगी और शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि यह स्थिति न केवल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन होगी बल्कि पूरे राज्य की शिक्षा प्रणाली में अस्थिरता ला सकती है। शिक्षकों की कमी के कारण कई विद्यालयों में कक्षाएं बाधित हो सकती हैं, जिससे ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
पहले से नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी लागू करना अनुचित
तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना सरकार की प्राथमिकता है लेकिन पहले से सेवा में कार्यरत शिक्षकों पर अचानक टीईटी लागू करना न्यायसंगत नहीं है। पुराने शिक्षकों ने उस समय की भर्ती नीतियों के अनुसार अपनी सेवाएं प्रारंभ की थीं और अब अचानक नई योग्यता की शर्तें थोपना उनके अधिकारों का हनन होगा। सरकार ने सुझाव दिया है कि इन शिक्षकों के लिए इन-सर्विस ट्रेनिंग, डिप्लोमा कोर्स या ब्रिज प्रोग्राम जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं, जिससे उनकी नौकरी पर कोई खतरा न आए और शिक्षा की गुणवत्ता भी बेहतर की जा सके। इस तरह बच्चों की पढ़ाई भी बिना बाधा के जारी रहेगी और शिक्षकों को भी अपने कौशल को निखारने का अवसर मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण की मांग
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह यह स्पष्ट करे कि टीईटी पास करने की पांच साल की समय सीमा केवल 1 अप्रैल 2010 के बाद नियुक्त शिक्षकों पर ही लागू होनी चाहिए। पुराने शिक्षकों को इस श्रेणी में लाना न केवल अनुचित होगा बल्कि इससे लाखों शिक्षकों के रोजगार पर संकट आ सकता है और पूरे शैक्षणिक तंत्र पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यह याचिका न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का असर भारत के लगभग 98 लाख शिक्षकों पर पड़ेगा। यदि अदालत पुराने शिक्षकों को भी इस नियम के दायरे में लाती है तो कई राज्यों को बड़े पैमाने पर शिक्षक भर्ती, प्रशिक्षण और पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
देशभर के शिक्षकों की निगाह सुप्रीम कोर्ट पर
टीईटी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय अब करोड़ों छात्रों और लाखों शिक्षकों के भविष्य को प्रभावित करेगा। जहां एक ओर सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए योग्यता मानकों को सख्त करना चाहती हैं, वहीं पुराने शिक्षक अपनी नियुक्ति के समय की शर्तों को आधार बनाकर राहत की मांग कर रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने वाले समय में शिक्षक भर्ती और योग्यता से संबंधित नीतियों के लिए दिशा तय कर सकता है। पुराने शिक्षकों को राहत मिलती है तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए स्थिरता का संदेश होगा जबकि अगर निर्णय सरकार के खिलाफ जाता है, तो बड़ी संख्या में शिक्षकों को दो साल में टीईटी पास करने की चुनौती का सामना करना होगा।
निष्कर्ष-
तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका देशभर में शिक्षकों से जुड़े एक अहम मुद्दे को सामने लाती है। एक ओर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का लक्ष्य है तो दूसरी ओर लाखों अनुभवी शिक्षकों की सेवाओं को सुरक्षित रखने की चुनौती भी है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले पर टिकी हैं जो यह तय करेगा कि 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू होगी या नहीं। इस निर्णय से न केवल शिक्षकों का भविष्य बल्कि देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होने वाली है।



