
बच्चों से बातचीत के सेशन में जब यह सवाल पूछा गया कि मोटरसाइकिल पर जाते वक्त अगर रास्ते में शिक्षक, पुलिस और लेखपाल ये तीनों लिफ्ट मांगें तो किसी एक में किसको बिठाओगे, तो पहले तो बच्चों ने थोड़ा सोचते हुए शिक्षक कहा शायद इसलिए क्योंकि पूछने व्यक्ति शिक्षक था लेकिन दुनियादारी से वाकिफ कुछ बच्चों ने मुस्कुराते हुए तुरंत जवाब दिया सर जी पुलिस को। वजह पूछने पर किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी मुस्कान और नजरें बहुत कुछ कह गईं।
बच्चों को भले ही समाजशास्त्र न पढ़ाया गया हो लेकिन उन्हें ताकत की भाषा समझ आ चुकी है। ये वही बच्चे हैं जो रोज स्कूल जाते हुए रास्ते में और समाज में, अपने घर में कहानियों और खबरों के जरिए पुलिस की वर्दी से डरना सीखते हैं जो जानते हैं कि लेखपाल के पास जमीन की किस्मत है और जो जानते हैं कि शिक्षक केवल पढ़ा सकता है, सिखा सकता है लेकिन उन्हें सीधे लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकता। इस छोटे से सवाल के जवाबों में हमारे समाज की प्राथमिकताएं और मूल्य व्यवस्था पूरी तरह उजागर हो जाती है। शिक्षक जो असल में समाज की नींव गढ़ता है, आज सबसे कमजोर समझा जाता है।
वो व्यक्ति जो बच्चों को सोचने की ताकत देता है अब खुद ताकतहीन प्रतीत होता है। दूसरी ओर वर्दीधारी पुलिस जो भय और शक्ति का प्रतीक बन चुकी है और लेखपाल जो सरकारी व्यवस्था में फैसला और फायदा बांटने का माध्यम है उन्हें पहले बिठाने की वजह यही है कि हमारे समाज में ताकत का सम्मान ज्यादा है और नैतिकता या ज्ञान का कम। यह चिंतन केवल बच्चों का नहीं बल्कि पूरे समाज का आइना है। जब एक बच्चा यह सोचने लगे कि किसी शिक्षक को बिठाने से कुछ नहीं मिलेगा लेकिन पुलिस को बिठाने से झंझट नहीं होगी तो समझ लीजिए कि शिक्षक की सामाजिक हैसियत अब प्रेरणा नहीं बल्कि सहानुभूति की मांग करने लगी है।
सवाल उठता है कि हमने कैसा समाज बनाया है जहां जो सबसे ज्यादा देता है वो सबसे कम माना जाता है। यह वक्त है न केवल शिक्षा व्यवस्था की बल्कि समाज की सोच को आईना दिखाने का। जब तक शिक्षक को सिर्फ एक मजबूर सेवा प्रदाता समझा जाएगा तब तक ज्ञान की असल ताकत और उसका सम्मान खोखला ही रहेगा।
राजेश कटियार, कानपुर ।



