लोकसभा में वंदे मातरम् पर चर्चा और परिणाम
राष्ट्रगीत की उपेक्षा और अस्वीकार करने वाले लोगों के लिए उनका सम्पूर्ण शब्द कोष तुष्टीकरण नीति के कारण सर्वथा खाली था !

कल 08 दिसम्बर 2025 को लोकसभा में लगभग 11 घंटे “वंदे मातरम् ,, राष्ट्र गीत पर चर्चा हुई,मोदी जी की एनडीए सरकार चर्चा तो करा रही थी “वंदे मातरम् राष्ट्र गीत,, पर परन्तु विपक्ष बार बार मुख्य विषय से हटकर घिसे पिटे पुराने मुद्दों की ओर भाग रहा था,अध्यक्षीय पीठ पर पीठासीन अधिकारी बार बार चर्चा के मुख्य बिन्दु पर बोलने का आग्रह भी कर रहे थे किन्तु संयुक्त विपक्ष के पास “वंदे मातरम् राष्ट्र गीत,, के सम्मान और देश भर में उसकी स्वीकार्यता कराने के लिए एक शब्द भी नहीं था ? राष्ट्रगीत की उपेक्षा और अस्वीकार करने वाले लोगों के लिए उनका सम्पूर्ण शब्द कोष तुष्टीकरण नीति के कारण सर्वथा खाली था !
लोकसभा में चली बहस की सम्पूर्ण चर्चा प्रतिचर्चा सुनकर लगा कि यदि अब हिन्दू मानव संस्कृति व सभ्यता को विकास की नई ऊंचाइयों तक ले जाना है,तो प्रत्येक हिन्दू जन मानस को अपनी अध्यात्मिकता की अन्तिम सरण में जाना ही होगा,अन्यथा की स्थिति में भारतीय सनातन संस्कृति और सनातन हिन्दू धर्म पर आने वाले संकटों से किसी दैवीय महापुरुष के अवतरण से इतर कोई और बचा भी नहीं सकता ! स्वतंत्रता संग्राम की क्रान्ति में जिस “वंदे मातरम् ,, गीत को सारभौमिक भारत माता का वंदन मानकर अनेक ज्ञात और अज्ञात क्रान्ति वीरों ने हंसते हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिये थे,स्वतंत्रता आन्दोलन में “वंदे मातरम् , स्वतंत्रता सेनानियों का मंत्र था,क्रान्तिकारियों की ऊर्जा का श्रोत था, उनके त्याग तपस्या और बलिदान का मूल मंत्र वंदे मातरम् था ! लेकिन उसी “वंदे मातरम् ,, गीत का मुहम्मद अली जिन्ना ने विरोध किया था ! स्वतंत्र भारत में “वंदे मातरम् ,, कहने व गाने और उसके सम्मान में खड़े होने पर अधिसंख्य मुस्लिम वर्ग व समुदाय को अभी भी सख्त ऐतराज है ! इस प्रकार के कई और गंभीर विचार बिन्दु भी अब वर्तमान भारत में प्रसांगिक हो गये हैं ! जिन पर अत्यन्त गम्भीरता से हिन्दू समाज को विचार करना ही चाहिए।
भारत को लम्बी गुलामी के तमाम बड़े बड़े झंझावातों को झेलकर 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिली थी,लेकिन आजादी तो मिली परन्तु आजादी मिलने से पूर्व ही भारत माता को विभाजन की पीड़ा दायक क्रूर विभीषिका झेलनी पड़ी ! विभाजित भारत दो अलग अलग राष्ट्रों के रूप में स्थापित हुआ ! स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दू मुस्लिम की अलग अलग धार्मिक भावनाओं के आधार पर मुस्लिम लीग की द्वी राष्ट्र की मांग पर विभाजन की संरचना का प्रतिपादन हुआ था ! तब कहा गया था कि – दोनों धर्म सम्प्रदाय एक साथ नहीं रह सकते ! क्योंकि दोनों धर्म सम्प्रदाय की जीवन शैली बेमेल है,और इन्हीं विचारों को दृष्टिगत रखकर भारत को विभाजन की क्रूर विभिषिका झेलनी पड़ी थी ! भारत माता का एक विभाजित टुकड़ा मुस्लिम धर्म सापेक्ष इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान बना ! तथा दूसरे टुकड़े का नाम भारत तो नहीं बदला गया,लेकिन भारत राष्ट्र को धर्म सापेक्ष नहीं बल्कि धर्म निर्पेक्ष राष्ट्र बनाया गया ! क्यों ? विभाजन के समय एक राष्ट्र धर्म सापेक्ष बना तो दूसरा राष्ट्र धर्म निर्पेक्ष क्यों और किन कारणों के आधार पर बना ? यह विषय वर्तमान भारत की नवश्रजित परिस्थितियों में अत्याधिक महत्वपूर्ण चिंतन का विषय बनता है।
चिंतन का विषय है कि भारत विभाजन के पूर्व में जिस तरह की परिस्थितियों का श्रजन मुस्लिम लीग के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने किया था,क्या उसी तरह की परिस्थितियों को भारत में पुनः श्रजित तो नहीं किया जा रहा है ? स्वतंत्रता से पूर्व मुहम्मद अली जिन्ना की भारत विभाजन की मांग पर लगभग मुस्लिम समुदाय उनके साथ व उनके पीछे खड़ा था ! कुछ उसी तरह की कोशिशें पुनः वर्तमान भारतीय परिवेश में परिलक्षित हो रही हैं,तब भारत विभाजन को स्वीकार करने वाली कांग्रेस पार्टी ने ही स्वतंत्र भारत की सत्ता भी संभाली थी,कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में रहते हुए मुस्लिम समुदाय को तुष्टीकृत करते हुए कई ऐसे महत्वपूर्ण परिवर्तन संविधान में किए जिनके कारण वर्तमान भारत में पुनः “गजवाये हिन्द,, और विविध जिहादी नारों की गूंज सुनाई देने लगी है,अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर शाहीनबाग जैसे आन्दोलन होने लगे हैं,मुस्लिम बाहुल्य नगर,गांव और मुहल्ले बनने लगे हैं,ऐसे नगर गांव एवं मुहल्लों से अब हिन्दू सनातन धर्म संस्कृति एवं पुरातन धार्मिक उत्सव व शोभायात्राएं धार्मिक कार्यक्रम उत्सव नहीं हो सकते ! यदि कही ऐसे धार्मिक कार्यक्रम होते हैं तो वहां पर खुलेआम आक्रमण किए जाते हैं ! तथा वहां प्रश्न उठाये जाते हैं कि हमारे मुस्लिम बाहुल्य इलाकों तथा हमारी इस्लामिक मस्जिदों मजारों के सामने से ऐसी धार्मिक शोभायात्राएं क्यों निकाली जाती हैं ? ऐसी कोई भी धार्मिक शोभायात्राएं किसी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों से नहीं निकाली जानी चाहिए !
“भारत माता की जय,, “वंदे मातरम् ,, का नारा नहीं लगाना चाहिए ! “जय श्रीराम का धार्मिक उद्घोष भी नहीं किया जाना चाहिए ! भारत एक बार पुनः संक्रमण काल से गुजर रहा है ! स्वतंत्रता से पूर्व मुहम्मद अली जिन्ना के साथ योगेन्द्र मंडल जैसे हिन्दू नेता भी उनके साथ खड़े थे ! उसी तरह वर्तमान में भी धर्म निर्पेक्षिता की आड़ में खड़े होकर कई हिन्दू समाज के नेता भी सत्ता प्राप्ति के लालच में मुस्लिम मान्यताओं का तुष्टीकरण करते हुए भारत माता को”डायन,,कहने वालों,वंदे मातरम् का विरोध करने वालों,जिहाद के समर्थकों के साथ पुनः खड़े हैं।
यहां विचारणीय है कि यदि भारत कभी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बन जाये तो क्या वो भारत धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र रह पायेगा ? भारत तब तक ही धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र है जब तक हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है ! भारत के हिन्दू जनसांख्यिकी के इस अन्तर को परिवर्तित करने के लिए सुनियोजित प्रयास चल रहे हैं जिसमें जनसंख्या वृद्धि,धर्मांतरण कराना, और अवैध बांगलादेशी रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत में आश्रय देकर उन्हे भारतीय नागरिकता के अवैध दस्तावेज उपलब्ध कराना प्रमुख हैं।
भारत की प्राचीन संस्कृति के भग्नावशेष स्पष्ट दर्शाते हैं कि भारत कभी समृद्धिशाली राष्ट्र था,कितनी बड़ी विडंबना है कि वर्तमान स्वतंत्र भारत अक्रान्ताओं द्वारा जलाये गये,तोड़े गये व ध्वस्त किये गये प्राचीन मठ मंदिरों स्मारकों के अवशेषों को पुनर्स्थापित करने में भी वो कांग्रेस पार्टी द्वारा संशोधित किया संविधान संशोधन संकट के रूप खड़ा हो जाता है,जिससे श्रीकृष्ण जन्मस्थली मथुरा,भगवान सदा शिव की नगरी काशी,और श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या जैसे धर्म स्थलों पर निर्माण कार्य कराना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने की श्रेणी में रखा जाता है,और कुछ लोग उस कार्य को संविधान विरोधी कृत्य कहते हुए थकते नहीं हैं ! भारत में मथुरा काशी रामेश्वरम् अयोध्या द्वारिका तीर्थों का हिन्दुओं के लिए उतना ही महत्व है,जितना मुस्लिम समुदाय के लिए मक्का और मदीना है !
लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत में रह गए मुस्लिम वर्ग समुदाय के लोग भारत के हुए उस साम्प्रदायिक विभाजन के बावजूद हिन्दुओं की किसी धार्मिक आस्था पर चोट करने से कभी भी नहीं चूकते ! “वंदे मातरम् ,, को कांग्रेस पार्टी की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा काट छाट करने के बाद भी जो लोग उसे नकारते हैं और कुछ लोग उन नकारने वालों की विचारधारा के साथ खड़े होते हैं,ऐसे लोग कभी भी भारतीय सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति और हिन्दू समाज के शुभचिंतक नहीं हो सकते ! यह बात लोकसभा में “वंदे मातरम् ,, पर चली लम्बी बहस में देखने को मिली ! जब कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन के लगभग सभी वक्ताओं ने मूल बिन्दु “वंदे मातरम् ,,पर चर्चा न करके सरकार को अन्य दूसरे मुद्दों पर भटकाते रहे ! किसी भी विपक्षी पार्टी के नेता ने “वंदे मातरम् ,, गीत को राष्ट्र हित में प्रत्येक भारतीय नागरिकों के लिए सर्व स्वीकार्यता कराने हेतु प्रेरित करने का कोई बयान नहीं आया !
बल्कि “वंदे मातरम् ,, गीत पर चर्चा कराये जाने के औचित्य का प्रश्नचिन्ह अवश्य खड़ा किया,प्रियंका गांधी कहूं य प्रियंका बढ़ेरा कहूं ने अपने उद्बोधन में कहा कि “वंदे मातरम,, पर चर्चा कराने की क्या जरूरत थी ? उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जिस गीत को संविधान सभा ने स्वीकार किया था,उस विषय पर पुनः चर्चा कराना देश की महान विभूतियों रविंद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और भीमराव अंबेडकर जैसी महान हस्तियों का अपमान है !
जबकि सरकार द्वारा चर्चा का उद्देश्य था “वंदे मातरम् ,, गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने पर स्वतंत्रता आन्दोलन में उसके महत्व को रेखांकित करके उस गीत की पवित्र उपयोगिता को अगली युवा पीढ़ी को हस्तांतरित करना था ! लेकिन विपक्ष की इच्छा इस पर चर्चा करने की नहीं थी ! जो कि मुस्लिम तुष्टीकरण करने का स्पष्ट संकेत है,कांग्रेस इंडी गठबंधन देश को किस दिशा में ले जाना चाहता है उसका दूरगामी परिणाम क्या होगा ? उपरोक्त सभी अति गम्भीर मुद्दों पर सनातन हिन्दू समाज को विचार अवश्य करना चाहिए ।
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॥ वंदे मातरम् ॥
एक विचार प्रवाह
विद्यासागर त्रिपाठी
मूसानगर कानपुर देहात उप्र.



