
कानपुर देहात। समाज में शिक्षक को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है, कविताओं से लेकर भाषणों तक। किताबों और अवसरों पर उसे माली, दीपक और दिशा देने वाला कहकर सराहा भी गया है लेकिन असलियत यह है कि पद, पावर और प्रतिष्ठा की दौड़ में शिक्षक सबसे पीछे खड़ा कर दिया गया है। डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर या नेता सब अपनी-अपनी जगह सत्ता और प्रभाव का हिस्सा बन जाते हैं लेकिन शिक्षक केवल तालियों और उपमाओं तक सीमित रह जाता है।
यही कारण है कि उसकी असली मौजूदगी और उसका महत्व धीरे-धीरे समाज की नजरों में गौण होता चला गया। समाज उसे मानता है पर महत्त्व नहीं देता उसकी जिम्मेदारी गिनाता है पर अधिकार नहीं सौंपता। उसके ज्ञान का लाभ उठाता है पर उसकी गरिमा को कभी संरक्षित नहीं करता। नतीजा यह हुआ कि शिक्षक का मानवीय पक्ष-उसकी सोच, उसकी दृष्टि, उसका संघर्ष-सब हाशिए पर चले गए। वह आदर्श की मूर्ति तो बना दिया गया लेकिन प्रभाव का पात्र नहीं बनने दिया गया।
असल अन्याय यही है कि शिक्षक को महत्व का प्रतीक तो घोषित कर दिया गया लेकिन महत्व का वास्तविक हिस्सा बनने से वंचित रखा गया। यही वजह है कि समाज में शिक्षक की कथा लिखी तो बहुत गई पर उसकी गूंज कभी सत्ता और प्रतिष्ठा के गलियारों तक नहीं पहुंच सकी। वर्तमान समय मे शिक्षक एक सरकारी कर्मचारी बनकर रह गया है। आज ना तो शिक्षक गुरु है और ना छात्र शिष्य के रूप में है। अनुशासन का घोर अभाव है। आज सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जा रही है। आज के समय में छात्र शिक्षकों पर विश्वास कम करते हैं और गूगल और यूट्यूब पर विश्वास अधिक करते हैं। शिक्षक को वह सम्मान नहीं मिल रहा है जिसका वह वास्तव में हकदार है।
राजेश कटियार



