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संघ का गुरू भगवा ध्वज हजारों वर्षों से प्रेरणा का प्रतीक- रवि

भगवा ध्वज से प्रेरणा लेकर हजारों साल से महापुरुषों ने भारत की कीर्ति का डंका दुनिया में बजाया है ।समर्पण भाव से राष्ट्र उत्थान में लगने के लिए यह ध्वज निरंतर प्रेरणा देता है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नगर संघचालक रवि द्विवेदी ने स्थानीय सरस्वती शिशु मंदिर में आर एस एस की माधव शाखा द्वारा रविवार को आयोजित गुरु पूर्णिमा उत्सव पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहीं.

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  • आर एस एस की माधव शाखा में गुरु पूर्णिमा उत्सव आयोजित

अमन यात्रा ब्यूरो पुखरायाँ कानपुर देहात। भगवा ध्वज से प्रेरणा लेकर हजारों साल से महापुरुषों ने भारत की कीर्ति का डंका दुनिया में बजाया है ।समर्पण भाव से राष्ट्र उत्थान में लगने के लिए यह ध्वज निरंतर प्रेरणा देता है।
यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नगर संघचालक रवि द्विवेदी ने स्थानीय सरस्वती शिशु मंदिर में आर एस एस की माधव शाखा द्वारा रविवार को आयोजित गुरु पूर्णिमा उत्सव पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहीं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यक्ति के बजाए तत्त्व रूपी परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु माना है जो हजारों साल से भारत के गौरवशाली अतीत का साक्षी और शाश्वत है।सूर्य के समान स्वयं जलकर दुनिया को प्रकाशमान करने वाले गुरु के समक्ष समर्पण का दिन है गुरु पूर्णिमा। करोना काल में डॉक्टरों ,सफाई कर्मी शिक्षकों ,समाज कार्य करने वालों ने अपने जीवन को दूसरों की सेवा और जीवन रक्षा में होम कर दिया।

समर्पण का यह भाव भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत से मिला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 98 वर्षों से शाखा जैसी कार्यशाला से करोड़ों स्वयंसेवकों को तैयार कर समाज के हर क्षेत्र में भारत के उत्थान में लगा है।
स्वयंसेवको के चलते ही अयोध्या में श्री राम मंदिर , कश्मीर में धारा 370 हटना व अब समान नागरिक संहिता जैसे विषयों में सार्थक परिणाम आ रहे है। आज हिंदू समाज को जाति पंथ के भेद मिटाकर हिंदुवा सहोदरा सर्वे का भाव लेकर संगठित होकर मातृभूमि की सेवा में सर्वस्व समर्पित करने का संकल्प लेने की आवश्यकता है तभी भारत अपना खोया हुआ विश्व गुरु का वैभव पा सकेगा।
इस अवसर पर संघ के सह जिला संघचालक प्रदीप सह ,नगर संघचालक राम सुदर्शन, नगर कार्यवाह शिवाजी सहकार्यवाह श्याम बाबा, डा.अभयदीप, विवेक ,सुमित रूद्र ,जीतेन्द्र,राजकिशोर,शिवम, रामप्रकाश ,शनि आदि रहे।

aman yatra
Author: aman yatra

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