
- शिवम लखनपाल ने 42 लाख सालाना की कॉर्परट जॉब से दिया इस्तीफा।
- मानसिक शांति और आत्म-सम्मान को पैसे से ऊपर रखा।
- हाई-प्रोफाइल जॉब के दौरान महसूस करते थे असुरक्षा और खालीपन।
- नौकरी छोड़ने के बाद बढ़ा आत्मविश्वास और जीवन जीने का नजरिया बदला।
- सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य बनाम आर्थिक सुरक्षा की बहस तेज।
आज के दौर में जहाँ हर युवा लाखों के पैकेज और कॉर्पोरेट ऊंचाइयों का सपना देखता है, वहीं शिवम लखनपाल नामक एक युवक ने इसके ठीक उलट फैसला लेकर सबको चौंका दिया है। शिवम ने सालाना 42 लाख रुपये की अपनी हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उनके इस फैसले ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या वाकई पैसा ही सफलता का एकमात्र पैमाना है।
ऊंचे वेतन के पीछे का अधूरापन
शिवम का कहना है कि बाहर से देखने पर उनकी जिंदगी बेहद शानदार लगती थी। उनके पास 42 लाख का पैकेज था और वह 18 लाख की शानदार कार में चलते थे। लेकिन इस सब के बावजूद, उन्हें अंदर से एक खालीपन महसूस होता था। उन्होंने साझा किया कि ऑफिस के माहौल में वह खुद को बहुत छोटा और असुरक्षित महसूस करते थे। उन्हें ऐसा लगता था जैसे वह सिर्फ दूसरों को खुश करने और कॉर्पोरेट सीढ़ी चढ़ने के लिए एक मुखौटा पहनकर जी रहे हैं।
जब अपनी ही कार में महसूस हुआ डर
एक हैरान करने वाले खुलासे में शिवम ने बताया कि जब उन्होंने 18 लाख की कार खरीदी थी, तब उन्हें उसमें बैठने में भी डर लगता था। उन्हें महसूस होता था कि वह इस सफलता के हकदार नहीं हैं। ऑफिस जाते समय वह खुद को ‘कमजोर’ महसूस करते थे क्योंकि उनकी पहचान सिर्फ उनके काम और सैलरी से जुड़ी थी, न कि उनके अपने व्यक्तित्व से।
नौकरी छोड़ने के बाद बदला नजरिया
शिवम के अनुसार, नौकरी छोड़ने का फैसला उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं रहा। जैसे ही उनके खाते में पैसे आने बंद हुए, उन्हें एक अजीब सी आजादी और आत्मविश्वास का अनुभव हुआ। अब वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और अपनी शर्तों पर जीवन जी रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस कार को चलाने में उन्हें पहले झिझक होती थी, अब वह उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ चलाते हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
शिवम की इस कहानी ने इंटरनेट पर लोगों को दो गुटों में बांट दिया है। जहाँ एक ओर लोग उनके साहस और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की सराहना कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे ‘प्रिविलेज’ या विशेषाधिकार बता रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि हर कोई बिना आर्थिक सुरक्षा के इतना बड़ा जोखिम नहीं उठा सकता।



