कविता

।। नारी के नाम का अस्तित्व आखिर! क्यूं हैं गुमनाम ।।

अमन यात्रा

।। नारी के नाम का अस्तित्व
आखिर! क्यूं हैं गुमनाम ।।
नारी
जन्म से ही अपने नाम से क्यूं नही जानी जाती ।
जन्म से लेकर विवाह पूर्व
वो,पहचानी जाती हैं  पिता के नाम से ।
ये सौभाग्य की बात हैं कि बेटी का वर्चस्व हैं जन्मदाता के नाम से ।।
पर
उसका,खुद का नाम कहां दब जाता हैं
कहा छूट जाता हैं।
विवाह उपरांत,
मिलता हैं भेंट उसको नाम पति या जीवनसाथी का ।
घर अपना वो छोड़ती हैं जाति अपनी वो बदलती हैं ।
विवाह के उपरांत
सिंदूर,पायल ,चूड़ी और मंगलसूत्र के सांकेतिक निशानियां सिर्फ और सिर्फ उसके नाम होते हैं ।।
आखिर !
ऐसा क्यों,
कुछ चीजें पुरुष के खाते में क्यूं नही लिखी जाती ।।
सारी निशानियां, नारी के नाम ही क्यूं ।
आखिर क्यूं,
शिशु के जन्म उपरांत
उस,शिशु की पहचान भी उसके पिता के नाम से मिलती हैं ।
नौ महीने गर्भ में मां रखती हैं
फिर,उसका नाम कहा ओझल हो जाता हैं ।।
नारी की अस्तित्व की रेखा आखिर
कहां छिप जाती हैं ।
उसके नाम से क्यूं नही जाने जाते
दोनों तरफ के घर बार
और पुकारे जाते हैं हर रिश्ते और पहचान।।
नारी से जीवन हैं
अस्तित्व हैं पुरुष का ।
फिर भी,आगे नाम नारी का क्यूं नही जुड़ता ।
क्यूं, हैं सूनापन और पिछड़ापन इस
रिश्ते की डोर में । । विचार कीजिए ।।
                                   स्नेहा कृति
(रचनाकार, पर्यावरण प्रेमी और राष्टीय सह संयोजक )
कानपुर उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

AD
Back to top button