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आदर्शवाद के बोझ तले दबी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक की जमीनी हकीकत
कठघरे में खड़े शिक्षकों की व्यथा: गैर-शैक्षिक कार्यों और प्रशासनिक दबाव ने छीनी शिक्षण गुणवत्ता

राजेश कटियार,कानपुर देहात: Kanpur Dehat सहित पूरे प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था के सुधार की जब भी बात उठती है, तो सबसे पहले शिक्षकों की कार्यप्रणाली को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। समाज और तंत्र द्वारा शिक्षक से नैतिकता व कर्तव्यनिष्ठा के अवास्तविक और उच्चतम मानकों की अपेक्षा तो की जाती है, परंतु उन बुनियादी और विषम परिस्थितियों की लगातार उपेक्षा होती रही है जिनमें वे अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। अत्यधिक भीड़भाड़ वाली कक्षाएं, संसाधनों का अभाव और लगातार बढ़ता प्रशासनिक दबाव शिक्षकों के दैनिक जीवन की सबसे बड़ी विसंगतियां बनकर उभरी हैं।
शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर नजर डालें तो शिक्षकों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की अपेक्षा रखने के साथ-साथ उन्हें गैर-शैक्षिक कार्यों की लंबी सूची में उलझा दिया जाता है। चुनाव, विभिन्न प्रकार के डेटा संकलन, सर्वेक्षण और प्रशासनिक रिपोर्टिंग के निरंतर दबाव के कारण शिक्षक अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी यानी शिक्षण से लगातार दूर हो रहे हैं। सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों के बीच जूझता शिक्षक समाज का ही एक अंग है, जिसे असीमित अपेक्षाओं के बोझ तले दबाने के बजाय उसकी वास्तविक समस्याओं और मानसिक तनाव को समझना तंत्र की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रशासनिक स्तर पर शिक्षा सुधार के दावों के बीच शिक्षकों के संवैधानिक और विधिक अधिकारों के संरक्षण की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। किसी भी शिक्षण संस्थान में व्यवस्था बिगाड़ने, अध्यापकों पर अनावश्यक दबाव बनाने या शैक्षणिक माहौल को दूषित करने वाले तत्वों के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की विधिक प्रक्रियाओं के तहत जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यदि कहीं भी शैक्षणिक तंत्र को बाधित करने अथवा लोक सेवकों के कार्य में अवैध हस्तक्षेप का प्रयास पाया जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के सुसंगत विधिक प्रावधानों के अंतर्गत कठोर प्रशासनिक संज्ञान लेना आवश्यक है ताकि शिक्षण कार्य निर्बाध रूप से संपन्न हो सके।



