परिषदीय विद्यालयों में बच्चों के आधार कार्ड बनवाएंगे मास्टर साहब
यह केवल अन्याय नहीं, यह मानसिक उत्पीड़न है

राजेश कटियार, कानपुर देहात। बेसिक शिक्षा विभाग में आधार नंबर पर ही बच्चों को योजनाओं का लाभ मिलेगा। परिषदीय विद्यालयों में नामांकित सभी बच्चों का आधार कार्ड बनवाने की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से प्रधानाध्यापकों को दी गई है। इसके लिए एक बार फिर प्रधानाध्यापकों को चेतावनी दी गई है कि शत प्रतिशत आधार कार्ड बनने की सूचना ब्लॉक संसाधन कार्यालय पर जमा करें नहीं तो वेतन रोक दिया जाएगा।
शिक्षाशास्त्री प्रवीण त्रिवेदी का कहना है कि आधार कार्ड बनवाना निस्संदेह एक आवश्यक सरकारी प्रक्रिया है परंतु यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनके हाथ में बच्चों का आधार बनवाने की कोई शक्ति ही नहीं वही शिक्षक आज इस प्रक्रिया के लिए सबसे अधिक प्रताड़ित किए जा रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों के दस्तावेज तैयार करें, ऑनलाइन जन्म प्रमाणपत्र की प्रक्रिया पूरी करें यह उनका दायित्व है परंतु अब यह सारा बोझ शिक्षकों के सिर पर लाद दिया गया है। जिन शिक्षकों का काम बच्चों को पढ़ाना, समझाना और प्रेरित करना है उन्हें अब घर-घर जाकर अभिभावकों के कागज, जन्म प्रमाणपत्र और ऑनलाइन फॉर्म की दौड़ में झोंक दिया गया है और यदि कोई अभिभावक उदासीन रहा या किसी तकनीकी कारण से आधार न बन पाया तो दोष शिक्षक का ठहराया जा रहा है।
कई जनपदों में शिक्षकों का महीनों का वेतन रोक दिया गया यह केवल अन्याय नहीं अपमान है। यह मानसिक उत्पीड़न है, जो शिक्षक की गरिमा और शिक्षा की भावना दोनों को चोट पहुंचा रहा है। पारदर्शिता के नाम पर नियंत्रण की अति हो गई है। आधार कार्ड पर निर्भरता इतनी बढ़ा दी गई है कि अब यह शिक्षा से जुड़ी कई योजनाओं की आत्मा बन चुका है परन्तु उसी ने विद्यालयों की आत्मा शिक्षक को सबसे कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया है।
बच्चे का आधार न बनने पर सजा शिक्षक को, डेटा मेल न खाने पर जवाबदेही शिक्षक की, तकनीकी त्रुटि पर भी दोष शिक्षक का आखिर यह कैसी नीति है। जिन्हें व्यवस्था संभालनी थी उन्होंने विवेक छोड़ कर आंकड़े संभालने शुरू कर दिए हैं। क्या यही स्मार्ट सिस्टम है जिसमें शिक्षक दोषी है और अभिभावक जिम्मेदारी से मुक्त। पारदर्शिता का मतलब दंड नहीं है लेकिन सहयोग होना चाहिए। आधार व्यवस्था का उद्देश्य नागरिक सुविधा था शिक्षक उत्पीड़न नहीं। समय है कि इस अन्याय पर ठहर कर सोचा जाए, जब शिक्षक ही प्रताड़ित रहेंगे तो शिक्षा की जड़ें कैसे मजबूत होंगी।
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