विदाई की बेला: थमी सुरों की तान, पर सौम्या की चोटियों में जिंदा रहेगी आशा ताई की ममता।
नन्ही लता को मिला था दुलार: आशा ताई की वो सीख, जिसने सौम्या शर्मा को बनाया खास।

कानपुर/मुंबई। सुरों की मल्लिका, भारतीय संगीत जगत का वह चमकता सितारा जिसने सात दशकों तक दुनिया को अपनी जादुई आवाज से मंत्रमुग्ध किया—आशा भोंसले ताई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनकी विदाई से आज न केवल पूरा देश शोकाकुल है, बल्कि कानपुर की नन्ही गायिका सौम्या शर्मा के लिए तो जैसे वक्त ही ठहर गया है। आशा ताई का जाना सौम्या के लिए एक व्यक्तिगत क्षति है, क्योंकि ताई ने सौम्या को सिर्फ आशीर्वाद नहीं दिया था, बल्कि उसमें अपनी बड़ी बहन ‘भारत रत्न’ लता दीदी की छवि देखी थी।
वह पल आज भी हर संगीत प्रेमी के जहन में ताजा है, जब स्टार प्लस के शो ‘दिल है हिंदुस्तानी 2’ के सेट पर आशा ताई ने अपनी ममता और उदारता से सबको भावुक कर दिया था।
जब सौम्या की गायकी देख ताई ने दांतों तले दबा ली थी उंगली
आशा ताई ने शो के दौरान खुद इस बात का खुलासा किया था कि वे और लता दीदी घर पर बैठकर सौम्या का ऑडिशन राउंड देख रही थीं। ताई ने मुख्य स्टेज पर बुलाकर सौम्या के सिर पर हाथ रखते हुए कहा था—
“ओ सौम्या, इधर मेरे पास आ। जब तू ‘आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूं’ गा रही थी, तो उसका अंतरा सुनकर मैंने अपने दांतों के बीच उंगली दबा ली थी। मुझे डर लग रहा था कि इतनी छोटी बच्ची इतने ऊंचे स्वर में गा रही है, कहीं गला रूंध न जाए। लेकिन तूने तो कमाल कर दिया, मैं देखती ही रह गई।”
सौम्या की बनाई थीं दो चोटियां, याद आया अपना बचपन
सेट पर उस दिन एक दुर्लभ और दिल को छू लेने वाला दृश्य दिखा था। आशा ताई ने भावुक होकर कहा था कि लता दीदी बचपन में उनकी चोटियां बनाती थीं और वे दीदी की। उस दिन आशा ताई ने मंच पर खुद सौम्या शर्मा की दो चोटियां बनाईं, मानो वे सौम्या में अपनी बड़ी बहन का बचपन देख रही हों। उन्होंने बड़े गर्व से कहा था— “लता दीदी अपनी कम उम्र में जैसा गाती थीं, वही झलक आज मुझे सौम्या में दिखाई देती है।”
एक युग का अंत, पर सीख हमेशा रहेगी साथ
आशा ताई ने सौम्या को सिर्फ दुलार नहीं दिया, बल्कि संगीत की वह अनमोल शिक्षा भी दी जो किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं मिल सकती। उन्होंने सौम्या को क्लासिकल संगीत की बारीकियां समझाईं और सबसे बड़ी सीख दी— “हर सॉन्ग को अपना बनाकर गाओ।”
आज भले ही आशा ताई शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन सौम्या शर्मा की हर तान में, उनकी उन दो चोटियों की यादों में और ताई द्वारा दी गई सीख में वे हमेशा जीवित रहेंगी। सौम्या के लिए यह सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि उस ‘आंचल’ का उठ जाना है जिसने उसे दुनिया के सामने ‘नन्ही लता’ के रूप में स्वीकारा था।
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