वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी बड़ा महत्वपूर्ण है छठ पर्व
छठ पर्व का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से गहरा महत्व है।वैज्ञानिक महत्व की अगर बात करें तो छठ पूजा में सूर्य की पूजा और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय अर्घ्य देना वैज्ञानिक रूप से भी लाभकारी माना जाता है।

छठ पर्व का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से गहरा महत्व है।वैज्ञानिक महत्व की अगर बात करें तो छठ पूजा में सूर्य की पूजा और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय अर्घ्य देना वैज्ञानिक रूप से भी लाभकारी माना जाता है। शोध के अनुसार सुबह 6 से 8 बजे और शाम 4 से 6 बजे के बीच की धूप में यूवी-बी किरणें संतुलित मात्रा में होती हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक नहीं होतीं बल्कि विटामिन डी के निर्माण में मदद करती हैं। विटामिन डी हड्डियों के लिए आवश्यक होता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। सूर्य की किरणें शरीर में डिटॉक्स का काम करती हैं और एंडोक्राइन सिस्टम को संतुलित कर मानसिक स्थिरता में सहायक होती हैं। उपवास, जल और भोजन का संयम, सूर्य की पूजा के साथ शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए प्राकृतिक तंत्रिका और हॉर्मोनल संतुलन बनाता है।
छठ पर्व सूर्य की पराबैंगनी किरणों के पृथ्वी पर सामान्य से अधिक मिलने के समय भी जुड़ा है, जो जीव-जंतुओं के लिए हितकर होता है और हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करता है। वहीं आध्यात्मिक महत्व की दिशा में देखें तो छठ पूजा सूर्यदेव को अर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है जो प्रकृति और जीवन के प्रति आभार व्यक्त करता है। धार्मिक ग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण, और देवी भागवत में इसका वर्णन मिलता है। महाभारत काल में कर्ण ने भी सूर्य की पूजा की थी। इस पर्व में सूर्य के प्रति श्रद्धा और प्रकृति के नियमों का सम्मान होता है। यह पर्व आत्मा, मन और शरीर के शुद्धिकरण का माध्यम है, जहां व्रती उपवास और ध्यान के जरिए आध्यात्मिक उन्नति करते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं।
इस प्रकार छठ पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह विज्ञान, स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता का सुंदर संगम है जो मनुष्य को प्रकृति के समीप लाकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों प्रदान करता है। यह पर्व जीवन में संतुलन, ऊर्जा और शुभता का स्रोत माना जाता है। अब जानें कि छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देने का वैज्ञानिक महत्व के बारे में तो यह शरीर, मन और वातावरण के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ा है।वैज्ञानिक तर्कसूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा बिलकुल वैज्ञानिक आधार पर है। इन समयों में सूर्य की पराबैंगनी किरणें नियंत्रित मात्रा में पृथ्वी पर पहुंचती हैं, जिससे शरीर को भरपूर मात्रा में विटामिन D मिलता है, जो हड्डियों, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक संतुलन के लिए लाभदायक है। जल में खड़े होकर सूर्य प्रकाश लेने से त्वचा, आंखों और हड्डियों को लाभ मिलता है।
ये किरणें प्राकृतिक रूप से शरीर का डिटॉक्स करती हैं और रोगाणुओं को नष्ट करती है। छठ के समय सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की खास स्थिति के कारण सूर्य की किरणें वायुमंडल में अपवर्तित और चंद्रमा की सतह से परावर्तित होकर पृथ्वी पर आती हैं, जिससे इन किरणों की सघनता बढ़ जाती है। यह प्रक्रिया हार्मोनल संतुलन और मानसिक शांति में भी मदद करती है; जल में खड़े होकर ध्याननिष्ठ स्थिति से मेलाटोनिन, सेरोटोनिन और अन्य हार्मोन सक्रिय होते हैं, जिससे मन एवं शरीर संतुलित रहते हैं। सूर्य ऊर्जा का स्रोत है और पेड़-पौधों में प्रकाश-संश्लेषण के माध्यम से ऑक्सीजन का उत्पादन होता है, जो वातावरण को शुद्ध करता है। इस तरह छठ में सूर्य को अर्घ्य देने से शारीरिक, मानसिक एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य सभी को लाभ होता है।
डॉ अनूप सचान



