गीतसाहित्य जगत
कान्हा की मुरली की तान और मनमोहक बाल लीलाएं, आल्हा तर्ज पर पढ़िए यह भक्तिमय रचना
जब यमुना किनारे बजती है मनमोहन की मधुर मुरलिया, झूम उठती हैं गैया और मोहित हो जाती हैं गोपियां
सुनि-सुनि गैया रही रंभाय।
श्याम-बरण प्रभु रूप मोहिनी,
मैया देखि-देखि मुस्काय॥
ग्वालन संग गइयन के पीछे,
लै लकुटी नित मोहन जाय।
गोपिन छेड़त यमुना तीरे,
सारी लै कान्हा छिपि जाय॥
लाख चिरौरी करैं गोपियाँ,
तब लै चीर प्रकट होइ जाय।
लीला अपरंपार तुम्हारी, सुर-नर-मुनि कोउ अंत न पाय॥
“सागर” वंदन करौं तुम्हारी,
कृपा करो भव-पारि लगाय।
काल डरावै निशि-दिन हमको,
अपनी शरण बुला लो धाय॥
तुम्हरी किरपा जा पर होई गई,
ताको भय जग में है नाय।
कागद, मसि अरु ज्ञान न मोरे,
हरि गुन कैसे लिक्खा जाय॥
दीन दयालु, दया के सागर,
तब चरणन में शीश नवाय।
जनम-जनम की आस यही है—कृपा करो, जीवन तरि जाय॥
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दया शंकर मिश्र ‘सागर’



