बजट 2026: रसोई की खुशहाली और भविष्य की सुरक्षा पर टिकीं आधी आबादी की निगाहें
केंद्रीय बजट 2026 की उल्टी गिनती शुरू होते ही आम जनमानस में इसे लेकर उत्सुकता और उम्मीदें परवान चढ़ने लगी हैं। विशेषकर घरेलू महिलाओं के लिए बजट केवल सरकारी आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उनके घर की रसोई, बच्चों की शिक्षा और दवाइयों के खर्च का लेखा-जोखा है

- 'घर का संतुलन और परिवार की जरूरतें ही हमारे लिए असली बजट'— सामाजिक कार्यकर्ता कंचन मिश्रा
सुशील त्रिवेदी,कानपुर देहात। केंद्रीय बजट 2026 की उल्टी गिनती शुरू होते ही आम जनमानस में इसे लेकर उत्सुकता और उम्मीदें परवान चढ़ने लगी हैं। विशेषकर घरेलू महिलाओं के लिए बजट केवल सरकारी आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उनके घर की रसोई, बच्चों की शिक्षा और दवाइयों के खर्च का लेखा-जोखा है। बजट की इन्हीं बारीकियों और अपेक्षाओं को लेकर सेवा संस्था से जुड़ी प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता कंचन मिश्रा ने अपनी बेबाक राय साझा की है।
महंगाई से राहत सबसे बड़ी प्राथमिकता
कंचन मिश्रा का कहना है कि एक गृहणी के लिए बजट का वास्तविक अर्थ घर का संतुलन बनाए रखना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस बार बजट से सबसे बड़ी उम्मीद महंगाई पर लगाम लगाने की है। राशन, हरी सब्जियां, रसोई गैस सिलेंडर और जीवन रक्षक दवाइयों के दाम अगर नियंत्रण में रहते हैं, तो एक मध्यमवर्गीय परिवार का प्रबंधन आसान हो जाता है।
सोना-चांदी: निवेश नहीं, सुरक्षा का प्रतीक
भारतीय संस्कृति में सोने और चांदी के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा:
“बेटी की शादी हो या भविष्य का कोई संकट, सोना-चांदी हर घर में सुरक्षा कवच माने जाते हैं। अगर सरकार इन पर टैक्स कम करती है, तो यह आम परिवारों के लिए एक बड़ी राहत होगी।”
आयकर में छूट और स्वास्थ्य-शिक्षा पर ध्यान
बजट में मध्यम वर्ग को आयकर (Income Tax) में राहत देने की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि टैक्स का बोझ कम होगा, तभी परिवारों की बचत बढ़ेगी। यह बचत सीधे तौर पर बच्चों की बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की योजनाओं में निवेश की जा सकेगी। इसके साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य बीमा को सस्ता करने और बेहतर शिक्षा सुविधाओं पर सरकारी खर्च बढ़ाने की मांग की है।
स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की ओर कदम
एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर कंचन मिश्रा ने महिलाओं के स्वरोजगार (Self-employment) पर भी विशेष ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि बजट में छोटे उद्योगों और घरेलू काम-काज से जुड़ी महिलाओं के लिए विशेष अवसर होने चाहिए, ताकि वे घर की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
निष्कर्ष: कंचन मिश्रा के विचार स्पष्ट करते हैं कि बजट का असली पैमाना आम आदमी की जेब और घर की थाली है। अब देखना यह है कि वित्त मंत्री के पिटारे से निकलने वाले फैसले इन उम्मीदों पर कितने खरे उतरते हैं।


