कविता

जीवन स्वयं गढ़ेंगी हम : प्रमोद दीक्षित “मलय”

अमन यात्रा

आसमान में उड़ने का कौशल है आजादी दो।
गिरि-शिखर झुकाने का साहस बल है आजादी दो।
मां पोषण-प्यार, दुलार हमें भी दो अब बेटों-सा,
सागर के सीने पर शौर्य लिखेंगी आजादी दो।।
बढ़े चरण न अब रोक सकेंगी नुकीली चट्टानें।
मंजिल पर कदम रुकेंगे संकल्प हृदय में ठाने।
तूफानों के शीश कुचलने का दमखम हममें है,
जीवन स्वयं गढ़ेंगी हम, पढ़ने की आजादी दो।
बीन राह के कंटक बाधाओं से हम खूब लड़े।
नभ, धरा, सागर पर कहां नहीं हमारे कदम पड़े।
श्वेत हिमालय की चादर पर पग-चिन्ह बनाये हैं,
फिर भी क्यों बंधन इतने, अब हमको आजादी दो।।
                       •••

शिक्षक, बांदा (उ.प्र.)। 

aman yatra
Author: aman yatra

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

AD
Back to top button