World Heritage Day: क्या आपने देखी हैं कानपुर देहात की ये 4 नायाब विरासतें? प्रशासन की बेरुखी के बीच सिसक रहा है इतिहास
भोगनीपुर का वो किला जहाँ अंग्रेजों के छूटे थे पसीने, आज भी दफन हैं आजादी के अनकहे राज!

पुखरायां, कानपुर देहात। आज ‘विश्व विरासत दिवस’ है। यह दिन महज कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उन पत्थरों और खंडहरों से संवाद करने का अवसर है जो सदियों से चुपचाप हमारे गौरवशाली अतीत की गवाही दे रहे हैं। भोगनीपुर तहसील क्षेत्र ऐसी ही ऐतिहासिक धरोहरों का ‘संग्रहालय’ है, जहाँ की हवाओं में आज भी ऋषियों के मंत्र और क्रांतिकारियों के जयघोष का अहसास होता है। आइए, रूबरू होते हैं इन अनमोल विरासतों से:
दुर्वासा ऋषि की तपस्थली: जहाँ गंगा ने खुद को झाड़ियों में बदला
मलसा विकास खंड के बरौर से महज पांच किलोमीटर दूर सेंगुर नदी के तट पर स्थित है दुर्वासा ऋषि का आश्रम। कहते हैं कि सतयुग में राजा दिलीप के पहले दुर्वासा ऋषि ने यहाँ घोर तपस्या की थी। जनश्रुति है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर साक्षात गंगा मैया यहाँ प्रकट हुईं। जब ऋषि ने उनकी पहचान पूछी, तो माँ गंगा ने आश्रम के पास ‘भाऊ’ (झाड़ियों) के रूप में उगने का वरदान दिया, जो आज भी वहां मौजूद हैं। गुप्तकाल में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण कराया था, जो आज भी आस्था का बड़ा केंद्र है।
चपरघटा का किला: आज़ादी के मतवालों का अभेद्य दुर्ग
यमुना और सेंगुर नदी के संगम पर खड़ा चपरघटा का किला आज भले ही अस्तित्व के संकट से जूझ रहा हो, लेकिन 1857 की क्रांति में यह इंकलाब का मुख्य केंद्र था। यहाँ के जांबाजों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलकर जीटी रोड और कालपी रोड पर फिरंगियों की नाक में दम कर दिया था। 16 और 17 अगस्त 1857 को यहाँ क्रांतिकारियों ने गोरिल्ला युद्ध कर अंग्रेजी फौज को खदेड़ दिया था। गुप्तकाल की वैभवशाली समृद्धि को समेटे यह किला आज सरकारी उपेक्षा के कारण गुमनामी के आंसू बहा रहा है।
मां मुक्तेश्वरी मंदिर: जहाँ गिरा था देवी का मुकुट
मूसानगर के समीप यमुना तट पर स्थित माँ मुक्तेश्वरी का मंदिर पौराणिक काल की अद्भुत मिसाल है। मान्यता है कि यहाँ सती का मुकुट गिरा था, जिसके कारण इन्हें मुक्तेश्वरी कहा गया। 1976 में पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहाँ 5000 साल पुरानी नरसिंह अवतार, विष्णु और शाक्यमुर्ति जैसी अनमोल प्रतिमाएं मिली थीं, जो कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर के शिल्प की याद दिलाती हैं। इस धरोहर को संजोने में टीकमगढ़ और दतिया के राजघरानों का भी बड़ा योगदान रहा है।
कालेश्वर मंदिर: वीरांगना लक्ष्मीबाई का सुरक्षा कवच
अमरौधा के पास स्थित प्राचीन कालेश्वर मंदिर का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। कहते हैं कि 1857 के संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने यहाँ शरण ली थी। यहाँ का शिवलिंग स्वयंभू है और मंदिर का प्रबंधन पीढ़ियों से मेहरोत्रा परिवार संभाल रहा है। सावन के महीने में यहाँ आस्था का सैलाब उमड़ता है। मंदिर परिसर में बनी पूर्व महंतों की समाधियां इसकी प्राचीनता को और गहरा करती हैं।
अमन यात्रा लाइव की अपील
ये धरोहरें हमारी जड़ें हैं। यदि हमने इन्हें नहीं सहेजा, तो आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को सिर्फ किताबों में ही पढ़ पाएंगी। प्रशासन की उपेक्षा के बावजूद इन स्थलों का आकर्षण आज भी देश-दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहा है। जरूरत है तो बस एक सार्थक प्रयास की, ताकि ये पत्थर फिर से अपनी कहानी सुना सकें।



