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डिजिटल हाजिरी और कागजी फाइलों में उलझा शिक्षक, समाज में अपमानित होने को मजबूर

लोग कसते हैं शिक्षकों पर तंज कि वे पढ़ाते नहीं

कभी समाज में सर्वोपरि और ईश्वर तुल्य स्थान पाने वाले शिक्षकों की स्थिति आज प्रशासनिक कागजी कार्यवाही और सामाजिक उपेक्षा के बीच एक असहाय कर्मचारी जैसी बनकर रह गई है। हाल ही में प्राथमिक विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक शैलेश बाबू के साथ हुई अभद्रता की घटना ने न केवल शिक्षकों की गरिमा पर चोट की है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की ढहती नींव पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​तीन दशकों से शिक्षा क्षेत्र में सेवा दे रहे शिक्षक शैलेश के अनुसार, समय के साथ शिक्षा का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जहाँ पहले शिक्षक का प्राथमिक दायित्व केवल अध्यापन था, वहीं आज उनका अधिकांश समय सरकारी ऐप्स पर डिजिटल हाजिरी दर्ज करने, मध्याह्न भोजन का हिसाब रखने और चुनावी व अन्य प्रशासनिक फाइलों को अपडेट करने में ही बीत जाता है।

​हालिया मामला उस समय तूल पकड़ गया जब कक्षा 5 के एक छात्र को लगातार तीन दिन तक गृहकार्य न करने पर केवल अनुशासित करने का प्रयास किया गया। इसके विरोध में छात्र के परिजन पंचायत प्रतिनिधियों के साथ जबरन कक्षा में प्रवेश कर गए। उन्होंने छोटे-छोटे विद्यार्थियों के समक्ष ही शिक्षक को अपमानित किया और उन्हें सीमा में रहने की चेतावनी दे डाली।

​इस दु:खद घटना पर गाँव के बुजुर्गों और प्रबुद्ध नागरिकों ने गहरा रोष व दुख प्रकट किया है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस समाज में शिक्षक का आदर समाप्त हो जाता है और उन्हें महज एक बंधुआ कर्मचारी मान लिया जाता है, वहाँ बुनियादी नैतिक मूल्य पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं। यह घटना केवल एक शिक्षक का अपमान नहीं बल्कि उन छोटे बच्चों के मन में गुरु के प्रति सम्मान और उनके उज्ज्वल भविष्य की नींव को हिलाने वाली है। जिस समाज में राष्ट्र निर्माता को असहाय बना दिया जाए, उस समाज का नैतिक पतन अवश्यंभावी है।

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