
शिक्षा व्यवस्था में बार-बार बदलते नियमों और शासनादेशों के कारण सरप्लस शिक्षक का मुद्दा एक गंभीर प्रशासनिक और मानसिक संकट बन चुका है। विभाग द्वारा नियमानुसार नियुक्त किए गए शिक्षकों को कुछ वर्षों बाद अचानक नई गणना या व्याख्या के आधार पर अतिरिक्त घोषित कर दिया जाता है। इसके बाद विरोध, अदालती कार्यवाही और नए आदेशों का एक कभी न खत्म होने वाला चक्र शुरू होता है जिससे शिक्षक मानसिक असुरक्षा में जीने को मजबूर हैं और इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
शिक्षा का अधिकार कानून का मूल मकसद हर विद्यालय में बच्चों की संख्या के अनुसार पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना था लेकिन अब यह व्यवस्था प्रदेश स्तर पर कुल शिक्षकों की प्रशासनिक गणना तक सिमट कर रह गई है। बार-बार नियम, गणना के आधार और विषयवार मानक बदलने से शिक्षकों का ध्यान पढ़ाई से हटकर अपने संभावित स्थानांतरण और कानूनी अनिश्चितता पर लगा रहता है। वर्षों तक सेवा देने वाले शिक्षकों पर अचानक ‘सरप्लस’ का ठप्पा लगाना उनके मनोबल को तोड़ता है और किसी भी संवेदनशील व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। इस समस्या का स्थायी समाधान हर कुछ महीनों में नए आदेश जारी करने के बजाय एक समग्र, स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति बनाने में है।
ऐसी नीति जो पिछले शासनादेशों, अदालती फैसलों, वास्तविक छात्र संख्या और सभी हितधारकों की राय का अध्ययन करके बनाई जाए तथा कम से कम पांच से दस वर्षों तक स्थिर रहे। शिक्षा व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब शिक्षकों को नीतिगत स्थिरता का भरोसा मिलेगा और शासन ऐसा वातावरण तैयार करेगा जहां शिक्षक अदालती चक्करों के बजाय अपना पूरा समय बच्चों को पढ़ाने में लगा सकें।
राजेश कटियार,कानपुर
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