
आदर्शों और उपमाओं के बोझ तले दबा शिक्षक आज पद, पावर और प्रतिष्ठा की दौड़ में सबसे पीछे छूट गया है। किताबों, भाषणों और मंचों पर उसे माली, दीपक और दिशा देने वाला कहकर सराहा तो बहुत जाता है लेकिन जब बात सत्ता और प्रभाव की आती है तो वह सिर्फ तालियों तक सीमित रह जाता है। डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर और नेता समाज में अपनी ताकत और हैसियत बना लेते हैं, जबकि शिक्षक की असली मौजूदगी धीरे-धीरे गौण होती जा रही है।
समाज शिक्षक से जिम्मेदारियों की उम्मीद तो पूरी रखता है लेकिन उसे अधिकार देने और उसकी गरिमा को सुरक्षित रखने से बचता है। उसे त्याग और आदर्श की मूर्ति बनाकर उसके मानवीय पक्ष उसकी सोच, संघर्ष और जरूरतों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। असली अन्याय यही है कि शिक्षक को महत्व का प्रतीक तो बना दिया गया पर महत्व का वास्तविक हिस्सा कभी नहीं बनने दिया गया जिससे उसकी आवाज कभी सत्ता और प्रतिष्ठा के गलियारों तक नहीं पहुंच सकी।
जब तक समाज उपदेश देने की मानसिकता छोड़कर शिक्षक को वास्तविक अधिकार, आर्थिक स्थिरता और निर्णय लेने की शक्ति नहीं देगा तब तक एक सशक्त समाज का सपना केवल भाषणों तक ही सीमित रहेगा।
राजेश कटियार, कानपुर



