देश और प्रदेश में teachers election duty education crisis का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ता जा रहा है। निर्वाचन और प्रशासनिक कार्यों में शिक्षकों तथा शिक्षण संस्थानों के अत्यधिक उपयोग के कारण प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। लोकतंत्र के पर्व के नाम पर बीएलओ ड्यूटी, मतदाता सूची पुनरीक्षण और मतदान प्रक्रिया का अधिकतम बोझ शिक्षकों के कंधों पर डाल दिया जाता है, जिससे उनकी मूल जिम्मेदारी पठन-पाठन पीछे छूट जाती है।
शिक्षण कार्य छोड़कर बीएलओ बनने को मजबूर शिक्षक
विशेषज्ञों और शिक्षक संगठनों का मानना है कि अन्य सरकारी विभागों में पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता के बावजूद केवल बेसिक और माध्यमिक शिक्षकों को इन गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंकना संसाधनों के असमान वितरण को दर्शाता है। महीनों तक चलने वाले चुनावी सर्वे और ड्यूटी के चलते विद्यालयों में नामांकित बच्चों का पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता। प्राथमिक विद्यालयों में एकल शिक्षक होने की स्थिति में स्कूल बंद होने या पढ़ाई पूरी तरह ठप होने की नौबत आ जाती है।
स्कूलों को चुनावी केंद्र बनाए जाने से बढ़ता व्यवधान
teachers election duty education crisis केवल शिक्षकों की ड्यूटी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव के समय स्कूलों और कॉलेजों के परिसरों को ही ईवीएम स्ट्रांग रूम, कर्मचारी प्रशिक्षण शिविर और चुनाव सामग्री वितरण का केंद्र बना दिया जाता है। इस प्रक्रिया में कई हफ्तों तक स्कूल परिसर में सामान्य कक्षाएं संचालित नहीं हो पातीं। परीक्षा और महत्वपूर्ण सत्र के दौरान पठन-पाठन में पड़ने वाले इस व्यवधान की भरपाई कर पाना मासूम बच्चों के लिए बेहद कठिन साबित होता है।
समान कार्य विभाजन और व्यवस्था में सुधार की मांग
विभिन्न शिक्षक संगठनों और प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि शिक्षकों पर प्रशासनिक दबाव बनाकर उन्हें विरोध का अवसर न देना उनके मूल अधिकारों और शिक्षा के अधिकार की मूल भावना का उल्लंघन है। यदि चुनाव वास्तव में एक साझा राष्ट्रीय दायित्व है, तो इसका कार्यभार सभी विभागों के कर्मचारियों के बीच समान रूप से बांटा जाना चाहिए। इससे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों के शैक्षणिक भविष्य की रक्षा हो सकेगी।



