
अक्सर कहा जाता है कि आपको जीवन में जितने अच्छे शिक्षक मिलते हैं वे आपकी किस्मत का लिखा होते हैं पर सच यह भी है कि लोग जिस कठोर पैमाने पर शिक्षक को तौलते हैं उसी पैमाने पर स्वयं को तौलने की कभी हिम्मत नहीं जुटा पाते। समाज में हर चर्चा गंभीर हो या अगंभीर जैसे ही शिक्षा पर आती है पहला निशाना शिक्षक ही बनता है। कारण यह नहीं कि शिक्षक सबसे कमजोर कड़ी है बल्कि इसलिए कि समाज अब भी शिक्षक से वही असंभव आदर्शवाद चाहता है जो वह किसी अन्य पेशे से नहीं मांगता। समस्या सिर्फ यह नहीं कि आलोचनाएं बढ़ रही हैं समस्या यह है कि आलोचनाएं उस दुनिया को देखकर की जाती हैं जिसका शिक्षक हिस्सा ही नहीं हैं।
ये वे लोग हैं जो गुरु से नैतिकता की मिसाल चाहते हैं पर उसी गुरु को मिलने वाली स्थितियों, सुविधाओं और सम्मान के बारे में बात करना अनावश्यक बहाना मानते हैं। भारत के अधिकांश शिक्षक विषम परिस्थितियों में काम करते हैं भीड़भरी कक्षाएं, अनंत गैर-शैक्षिक कार्य, प्रशासनिक दबाव, अभिभावकों की अपेक्षाएँ, बदलते पाठ्यक्रम और हर मोड़ पर तुमसे गलती हुई का चाबुक फिर भी उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल बच्चों को पढ़ाएँ बल्कि उनकी भावनाओं के संरक्षक, समाज के मार्गदर्शक और सरकार की हर योजना के मुताबिक़ तुरंत ढल जाने वाली मशीन भी बनें। जिस व्यवस्था में शिक्षक लगातार समस्याओं से जूझता है, वहाँ उससे यह उम्मीद रखना कि वह हर दिन आदर्श गुरु ही बनकर दिखे, असल में अव्यवहारिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। जो लोग कल्पना में एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जहाँ शिक्षक तो नैतिकता की प्रतिमूर्ति हो लेकिन बाकी समाज अपने आराम और सुविधाओं में लिप्त रहे वे उस खाई को देखने से इनकार करते हैं जिसमें शिक्षक रोज उतरता है।
यह खाई वास्तविक है आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक और प्रशासनिक और उसकी गहराई सिर्फ वही जानता है जो प्रतिदिन उसमें कदम रखता है। आदर्शवाद का बोझ तभी तक अच्छा लगता है जब तक वह किताबों में हो, वास्तविकता में वही बोझ अक्सर शिक्षक की रचनात्मकता, उसकी स्वतंत्रता और कभी-कभी उसकी आत्मा को भी दबा देता है इसलिए बात शिक्षक को महिमामंडित या बदनाम करने की नहीं है बात यह समझने की है कि शिक्षक किसी अलग ग्रह का जीव नहीं है। वह भी इसी समाज का हिस्सा है, उन्हीं दबावों, उन्हीं संघर्षों और उन्हीं कमजोरियों के साथ।
उससे ऊँचे मानदंड रखने में कोई बुराई नहीं लेकिन यह उम्मीद करना कि वह समाज से अप्रभावित रहेगा, व्यवहार की दुनिया में नहीं, ख्याली पुलाव की दुनिया में आता है। जो शिक्षक तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपना काम करते चलते हैं वे किसी आदर्शवादी मूर्ति से कहीं अधिक वास्तविक और सम्मान के योग्य हैं क्योंकि वे लड़ते हैं, टिके रहते हैं और बच्चों के भविष्य को आकार देते हुए अपनी खुद की सीमाओं से रोज़ जूझते हैं।
राजेश कटियार,कानपुर



