जरा हटकेआपकी बात

शिक्षा व्यवस्था की खराब स्थिति के लिए आखिर दोषी कौन

जब राजनीति मूल्यहीन हो जाती है तब शिक्षा भी दिशाहीन हो जाती है

राजेश कटियार,कानपुर देहात। शिक्षा व्यवस्था की खराब स्थिति के लिए यह मान लेना कि व्यवस्था में जो कुछ भी गलत है, वह केवल उसी व्यवस्था की देन है और उसी के भीतर बैठे लोगों की नैतिक विफलता का प्रमाण है अपने आप में एक अधूरा और सुविधाजनक निष्कर्ष है। कोई भी सामाजिक संरचना पूरी तरह ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होती और शिक्षा व्यवस्था तो बिल्कुल भी नहीं। उसी तंत्र से बाबू भी निकलते हैं चपरासी भी, शिक्षक भी और अधिकारी भी और उसी तंत्र से ईमानदार, योग्य और प्रतिबद्ध लोग भी जन्म लेते हैं।

यदि ऐसा न होता तो आज भी समाज में कुछ भरोसे, कुछ आदर्श और कुछ नैतिक मानक बचे ही न होते। असली प्रश्न यह नहीं है कि अच्छे लोग पैदा हो रहे हैं या नहीं, असली प्रश्न यह है कि वे दिखाई क्यों नहीं देते और क्यों व्यवस्था के शोर में उनकी आवाज दबा दी जाती है। अच्छे और ईमानदार लोग अक्सर इसलिए लाइमलाइट में नहीं आ पाते क्योंकि वे व्यवस्था के शोर में शामिल नहीं होते। वे न तो प्रचार की भाषा जानते हैं, न ही ताकतवर की चाटुकारिता में सहज होते हैं। वे नियमों की आड़ में गलत को सही ठहराने की कला नहीं सीखते और न ही अनैतिक तरीकों से आगे बढ़ने को व्यावहारिक बुद्धि मानते हैं। ऐसी स्थिति में व्यवस्था उन्हें उपयोगी नहीं असुविधाजनक मानती है।

नतीजा यह होता है कि चमकते उदाहरण नहीं बल्कि शोर मचाने वाले चेहरे सामने आते हैं और ईमानदारी धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दी जाती है। शिक्षा व्यवस्था की अहमियत पर कोई दो राय नहीं हो सकती लेकिन यह मान लेना कि वही अकेली परिवर्तन की इंजन है एक खतरनाक भ्रम है। शिक्षा की शक्ति को दिशा और गति देने का काम राजनीतिक व्यवस्था करती है। जब राजनीति मूल्यहीन हो जाती है तब शिक्षा भी दिशाहीन हो जाती है। पाठ्यक्रम बदले जा सकते हैं, प्रशिक्षण दिए जा सकते हैं, नियम लिखे जा सकते हैं लेकिन जब ऊपर बैठी व्यवस्था ही नैतिक रूप से खोखली हो तो नीचे से उठने वाला हर सुधार अंततः दम तोड़ देता है। जिस समाज में सत्ता ही अनैतिक रास्तों को सफलता का शॉर्टकट बना दे वहाँ शिक्षा से चरित्र निर्माण की उम्मीद करना आत्मविरोध है। यह भी मानना होगा कि व्यक्ति केवल विद्यालय से ही शिक्षित और संस्कारित नहीं होता।

समाज, परिवार, मीडिया और सार्वजनिक जीवन सब मिलकर व्यक्ति को गढ़ते हैं। यदि एक ओर विद्यालय नैतिकता की बात करे और दूसरी ओर समाज सफलता के लिए छल, जोड़-तोड़ और अवसरवाद का उत्सव मनाए तो बच्चे किससे सीखेंगे? जब सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी मूर्खता और चालाकी बुद्धिमानी कहलाने लगे तब शिक्षा व्यवस्था अकेले नैतिक पहरेदार नहीं बन सकती।

पथभ्रष्टों को मिलने वाला सामाजिक संरक्षण, उनके तरीकों को मिलने वाली चुप स्वीकृति और कई बार खुली सराहना ये सब मिलकर शिक्षा के प्रयासों को भीतर से कमजोर करते हैं इसलिए परिवर्तन की जिम्मेदारी को केवल शिक्षा व्यवस्था के सिर मढ़ देना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक। यदि सचमुच बदलाव चाहिए तो राजनीतिक व्यवस्था की सड़ांध को स्वीकार करना होगा, सामाजिक मूल्यों की गिरावट पर ईमानदारी से बात करनी होगी और ईमानदार लोगों को हाशिए से निकालकर केंद्र में लाने का साहस दिखाना होगा। वरना हम हर पीढ़ी से वही सवाल पूछते रहेंगे कि अच्छे लोग कहाँ हैं जबकि सच यह है कि वे मौजूद हैं बस हमारी व्यवस्था उन्हें देखने और सुनने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है।

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aman yatra
Author: aman yatra

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