जरा हटकेआपकी बात

मंच मिल जाए तो अंगूठा टेक भी ज्ञानी बन जाते हैं

नहीं लिख पाते अपने पिता का नाम, और हिंदुस्तान के इतिहास को बदलने की बात कह जाते हैं

मंच मिल जाए तो शिक्षक को नसीहत देने वालों की लाइन लग जाती है नेता भी, अभिनेता भी और वे भी जिनकी अपनी खुद की जिंदगी का रिपोर्ट कार्ड दागदार है। हर कोई मानो शिक्षा विशेषज्ञ हो गया है, बस ब्लैकबोर्ड पर चॉक पकड़ना बाकी रह गया है। शिक्षक को सीख देने का यह शौक इसलिए इतना सस्ता है क्योंकि शिक्षक के पास पावर नहीं है। अगर उसके पास निर्णय करने की ताकत होती तो शायद ये सब प्रवचन देने वाले अपने शब्दों को निगल जाते।

समाज में शिक्षक को मॉरल आइकन बनाकर रख दिया गया पर उसकी बात, उसकी पीड़ा, उसकी परिस्थितियों को सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं। सब चाहते हैं कि वह संस्कार सिखाए, पर कोई नहीं देखता कि उसे खुद कितनी असंस्कृत व्यवस्थाओं से जूझना पड़ता है। जो ताली बजाते हैं, वही बाद में उसकी गलतियों का पोस्टमार्टम करते हैं। विडंबना यह है कि जो अपनी गलतियों से सीखना तो दूर, स्वीकार भी नहीं कर पाते वही शिक्षक को सुधार का मंत्र देने निकल पड़ते हैं। असल में शिक्षक आसान निशाना है। वह न तो स्टेज पर चिल्ला सकता है, न कैमरे पर अभिनय कर सकता है, न राजनीति की चालों में उलझा सकता है। वह केवल अपने बोर्ड पर, अपने बच्चों के बीच बोलता है और वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती है।

यही कारण है कि मंच पर खड़े प्रवचनकार अपने झूठे आदर्शों के बखान करते हैं और समाज उनके झांसे में आकर उस शिक्षक को दोषी ठहराता है जो दिन-रात भविष्य गढ़ने में लगा है। दुनिया भूल गई है कि जिसने सबको बोलना सिखाया, उसकी आवाज आज सबसे कम सुनी जाती है। शिक्षक इसलिए नहीं मौन है कि उसके पास शब्द नहीं बल्कि इसलिए कि बोलने की इजाजत उसे कभी दी ही नहीं गई।

 

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राजेश कटियार,कानपुर

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