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फाइलों में भागीदारी फैसलों में तानाशाही नीति की मेज पर दम तोड़ता संवाद

शिक्षकों और खंड शिक्षा अधिकारियों द्वारा तीन घंटे में तैयार ड्राफ्ट को शीर्ष अधिकारी ने खारिज किया।

शिक्षकों और अधिकारियों के जमीनी अनुभवों को दरकिनार कर बंद कमरों में नीतियां थोप दिए जाने का एक ताजा मामला सामने आया है। एक सरकारी शैक्षिक संस्थान में शिक्षकों के लिए क्या करें और क्या न करें तय करने के लिए बुलाई गई बैठक महज एक औपचारिक कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई। ​बैठक में मौजूद शिक्षकों और खंड शिक्षा अधिकारियों ने करीब तीन घंटे तक कक्षा की वास्तविक परिस्थितियों, अनुशासन, शिक्षण व्यवस्था और अभिभावक-शिक्षक संवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर मंथन कर एक ड्राफ्ट तैयार किया था हालांकि, संस्थान के शीर्ष अधिकारी के एकतरफा रवैये के कारण यह पूरी मेहनत मिनटों में अप्रासंगिक हो गई।

राज्य भर से आए शिक्षकों ने अपने वर्षों के व्यावहारिक अनुभवों को ध्यान में रखकर दिशा-निर्देश तैयार किए थे। शीर्ष अधिकारी ने शिक्षकों द्वारा तैयार ड्राफ्ट पर बिना किसी तर्क या चर्चा के अपने व्यक्तिगत विचार थोप दिए और संवाद का मौका ही नहीं दिया। अधिकारी के इस निर्णय के बाद कमरे में सन्नाटा छा गया और निराश शिक्षक बिना किसी विरोध के अपनी फाइलें समेटकर बाहर निकल गए।

​नीति-निर्माण पर उठते सवाल
​इस घटना ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और परामर्श बैठकों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि निर्णय पहले से तय था तो जमीनी स्तर के शिक्षकों को आमंत्रित करने और सुझाव मांगने का नाटक क्यों किया गया? ​शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी नीति केवल कागजों पर नहीं बल्कि संवाद से जीवित होती है। जमीनी सच्चाई से कटकर और शिक्षकों का विश्वास खोकर बनाई गई नीतियां केवल फाइलों की शोभा बढ़ाती हैं वे कभी धरातल पर सफल नहीं हो पातीं।

 

राजेश कटियार,कानपुर 

 

 

 


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