जरा हटकेआपकी बात

ऊंची-ऊंची इमारतों की चकाचौंध में खो गई है शिक्षा

 ब्रांड के नाप पर वसूल रहे हैं भारी फीस

आज शिक्षा का सबसे बड़ा बाजार सीखने का नहीं दिखने का बाजार बन चुका है। बड़े ब्रांडेड स्कूलों का पूरा खेल अब शिक्षा की गुणवत्ता से कहीं ज्यादा टॉपर मैनेजमेंट पर टिक गया है। असली लक्ष्य हर बच्चे को बेहतर बनाना नहीं बल्कि कुछ पहले से तेज बच्चों को अपने ब्रांड की शोकेस में खड़ा कर देना है फिर वही बच्चे अगले साल के एडमिशन अभियान का पोस्टर बन जाते हैं बाकी हजारों बच्चों का संघर्ष, औसत प्रदर्शन, मानसिक दबाव और वास्तविक सीखना पीछे छूट जाता है।

आज बड़े स्कूलों का मॉडल बहुत साफ है जिले, शहर या कोचिंग जगत के संभावित टॉपर बच्चों को किसी भी तरह अपने यहाँ जोड़ लो। किसी को फीस में छूट, किसी को विशेष बैच, किसी को अतिरिक्त सुविधाएँ, किसी को अलग मेंटरिंग और कई स्कूल तो अब गिफ्ट के साथ लाखों की चेक भी देने का ऐलान करते हैं, फिर रिजल्ट आते ही उन बच्चों की तस्वीरें पूरे शहर में टांग देते हैं। होर्डिंग्स, अखबार, एलईडी स्क्रीन, सोशल मीडिया, रेडियो, डिजिटल विज्ञापन हर जगह वही चेहरे।

ऐसा माहौल बनाया जाता है जैसे उन बच्चों की सफलता का जन्म उसी स्कूल की दीवारों के भीतर हुआ हो। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई स्कूल सचमुच इतना उत्कृष्ट है तो फिर उसे हर साल तैयार टॉपर्स खोजने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्यों नहीं वह सामान्य और संघर्षरत बच्चों को लेकर उन्हें असाधारण बनाता है क्योंकि वहाँ शिक्षा नहीं, ब्रांडिंग चल रही है। वहाँ रिजल्ट भी कई बार शिक्षा से ज्यादा मार्केटिंग का उत्पाद बन चुका है। स्थिति अब इतनी विचित्र हो चुकी है कि कई अखबारों में बोर्ड रिजल्ट के समय आधा पेज विज्ञापन पुरानी बात हो गई। अब तो पूरे-पूरे 6 से 8 पेज के परिशिष्ट केवल स्कूलों के गौरवशाली परिणामों से भर जाते हैं। हर पेज पर मुस्कुराते बच्चे, रैंक, प्रतिशत, चयन, मेडिकल-इंजीनियरिंग में सलेक्शन।

ऐसा लगता है जैसे शिक्षा नहीं, कोई रियल एस्टेट एक्सपो चल रहा हो और मजेदार बात यह है कि इन विज्ञापनों का खर्च आखिरकार किसकी जेब से निकलता है? उन्हीं अभिभावकों की जेब से, जो यह सोचकर मोटी फीस भरते हैं कि पैसा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है। सच यह है कि आज कई ब्रांडेड स्कूलों का बड़ा हिस्सा शिक्षण संस्थान कम और इमेज मैनेजमेंट कंपनी ज्यादा बनता जा रहा है। वहाँ बच्चों को विद्यार्थी से पहले रिजल्ट यूनिट की तरह देखा जाता है।

टॉपर बच्चा स्कूल की ट्रॉफी है, औसत बच्चा फीस देने वाला ग्राहक और कमजोर बच्चा अक्सर स्कूल की ब्रांडिंग के लिए असुविधाजनक सत्य। इस पूरी व्यवस्था ने शिक्षा को सामूहिक विकास से हटाकर प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन में बदल दिया है। स्कूल अब यह कम बताते हैं कि उन्होंने कितने कमजोर बच्चों को संभाला, कितनों में आत्मविश्वास जगाया, कितनों को जीवन कौशल दिए। वे केवल यह बताते हैं कि हमारे इतने बच्चों ने 99 फीसदी लाया। यानी शिक्षा का पूरा विमर्श कुछ अंकों के इर्द-गिर्द कैद हो गया है।

सबसे दुखद यह है कि समाज भी इस चमकदार प्रचार को ही शिक्षा की गुणवत्ता मान बैठा है। बड़ा विज्ञापन मतलब बड़ा स्कूल। बड़ी होर्डिंग मतलब बड़ी पढ़ाई जबकि कई बार असली शिक्षा उन साधारण स्कूलों में चल रही होती है जहाँ न शहरभर में बैनर लगते हैं, न टॉपर्स की फोटो से अखबार रंगे जाते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को ब्रांड युद्ध बनने से बचाया जाए। वरना आने वाले समय में स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और विज्ञापन उद्योग के विस्तार अधिक दिखाई देंगे जहाँ बच्चों की उपलब्धियाँ भी सीखने से पहले मार्केटिंग सामग्री में बदल जाएँगी।


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राजेश कटियार,कानपुर

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