
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और रामऔतार मास्टर साहब को पहली बार अपने बारे में एक ऐसी जानकारी मिली जो उन्हें सत्ताईस साल की नौकरी में कभी नहीं मिली थी। उन्हें पता चला कि वे इतने वर्षों से बच्चों को पढ़ा तो रहे थे लेकिन अब यह निश्चित नहीं है कि वे वास्तव में शिक्षक भी थे या नहीं क्योंकि शिक्षक होने का प्रमाण उनके विद्यार्थियों की सफलताएँ नहीं, उनकी कक्षाओं का वातावरण नहीं, गाँव के लोगों का सम्मान नहीं बल्कि एक ऐसी परीक्षा थी जिसे उन्होंने कभी पास नहीं किया था। रामऔतार जी थोड़ा परेशान हुए। उन्हें अपने ऊपर नहीं अपने पूरे अतीत पर संदेह होने लगा। उन्होंने सोचा कि जिन बच्चों को उन्होंने वर्णमाला सिखाई, जिनके हाथ पकड़कर पहली बार पेंसिल चलवाई, जिनके घर जाकर उन्हें स्कूल वापस लाए, जिनकी फीस भरी, जिनके अभिभावकों को समझाया वे सब आखिर किस अधिकार से किया? जब वे स्वयं प्रमाणित शिक्षक नहीं थे तो यह सब कैसे कर गए? उधर सोशल मीडिया पर माहौल ऐसा था जैसे भारत के सारे शैक्षिक संकट का असली अपराधी आखिरकार पकड़ लिया गया हो।
कोई लिख रहा था कि देश की शिक्षा का सत्यानाश नॉन-टीईटी लोगों ने किया। कोई बता रहा था कि अगर टीईटी पहले आ गई होती तो आज भारत जापान, अमेरिका और जर्मनी को पीछे छोड़ चुका होता। कुछ उत्साही लोग तो ऐसे लिख रहे थे जैसे टीईटी कोई परीक्षा नहीं बल्कि शिक्षा जगत की पेनिसिलिन हो जिसके आविष्कार ने करोड़ों बच्चों का भविष्य बचा लिया हो। रामऔतार जी ने सोचा कि यदि यह सच है तो टीईटी के खोजकर्ता को केवल पुरस्कार नहीं राष्ट्रीय सम्मान भी मिलना चाहिए। आखिर जिसने एक परीक्षा से शिक्षा की सारी समस्याओं का समाधान खोज लिया, वह साधारण व्यक्ति तो हो ही नहीं सकता फिर उन्होंने जिज्ञासावश कुछ टीईटी प्रश्नपत्र देखे। एक प्रश्न पूछ रहा था कि अमुक शिक्षाशास्त्री का सिद्धांत क्या है। दूसरा पूछ रहा था कि अमुक आयोग किस वर्ष बना था। तीसरा पूछ रहा था कि फलाँ अवधारणा का सही विकल्प कौन-सा है।
रामऔतार जी ने सिर खुजलाया और सोचा कि शायद अगले पन्ने पर यह भी पूछा जाएगा कि रोते हुए बच्चे को कैसे संभालें, पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी को सीखने के लिए कैसे प्रेरित करें या उस बच्चे तक कैसे पहुँचा जाए जो रोज भूखा स्कूल आता है लेकिन अगले पन्ने पर भी विकल्प A, B, C और D ही मिले। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि इस देश में शिक्षण और परीक्षा पास करने के बीच का संबंध उतना ही रहस्यमय है जितना राजनीति और जनसेवा के बीच का। उधर स्टाफ रूम में बहस चल रही थी। एक शिक्षक गर्व से बोले मेरे टीईटी में 90 अंक आ गए।
दूसरे ने कहा मेरे 89। रामऔतार जी मुस्कुराए और बोले तो एक बात बताओ। अगर एक प्रश्न तुमसे गलत हो जाता और उनसे सही हो जाता, तो अगले दिन से वह तुमसे बेहतर शिक्षक बन जाते क्या? कमरे में अचानक वही सन्नाटा छा गया जो निरीक्षण के समय बच्चों की कक्षा में छा जाता है। रामऔतार की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं थी कि टीईटी अनिवार्य है। उनकी समस्या यह थी कि कोई यह बताने को तैयार नहीं था कि एक अच्छा शिक्षक आखिर होता कैसे है। क्या वह जो तीन घंटे में सही विकल्प पहचान ले या वह जो तीस बच्चों की अलग-अलग समस्याओं, अलग-अलग क्षमताओं और अलग-अलग सपनों के बीच रास्ता बना ले? क्या वह जो उत्तर पुस्तिका में अंक ले आए? या वह जो किसी बच्चे के जीवन में आशा जगा दे? उन्हें लगा कि बहस धीरे-धीरे शिक्षक से हटकर परीक्षार्थी पर आ गई है।
शिक्षा से हटकर प्रमाणपत्र पर आ गई है। कक्षा से हटकर कटऑफ पर आ गई है और सबसे मजेदार बात यह है कि जो लोग टीईटी को शिक्षक गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण मान रहे हैं वे भी यह नहीं बता पा रहे कि टीईटी लागू होने के बाद शिक्षा में वह कौन-सी क्रांति आ गई जिसका वादा किया गया था। आज भी रामऔतार जी रोज स्कूल जाते हैं। बच्चे उन्हें देखते ही गुरुजी नमस्ते कहते हैं। अभिभावक अब भी सलाह लेने आते हैं। गाँव वाले अब भी सम्मान से कुर्सी खींच देते हैं। फर्क बस इतना है कि अब रामऔतार कभी-कभी मुस्कुरा देते हैं।
उन्हें लगता है कि सत्ताईस साल पढ़ाने के बाद उन्होंने शिक्षा का सबसे बड़ा पाठ सीखा है कि इस देश में कभी-कभी एक शिक्षक को यह साबित करने के लिए कि वह बच्चों को पढ़ा सकता है, उन लोगों के बनाए प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है जिन्होंने उसे कभी पढ़ाते हुए देखा ही नहीं और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य है। शिक्षा की दुनिया में सबसे कठिन काम अच्छा शिक्षक बनना नहीं है बल्कि यह साबित करना है कि आप अच्छे शिक्षक हैं।
राजेश कटियार,कानपुर



