
किसी भी व्यवस्था की सबसे पहली शर्त न्याय है और न्याय की पहली शर्त स्थिरता। यदि कोई व्यक्ति उस समय लागू नियमों, योग्यताओं और चयन प्रक्रिया के आधार पर नियुक्त हुआ, वर्षों तक सेवा देता रहा, बच्चों को पढ़ाता रहा, वेतन पाता रहा, विभाग उससे काम लेता रहा और फिर अचानक वर्षों बाद कहा जाए कि अब तुम्हें नई शर्त पूरी करनी होगी वरना नौकरी पर संकट है तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, भरोसे पर प्रहार है।
इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सोची समझी रणनीति के तहत सरकारी स्कूलों को बंद करना चाहती है। जब आरटीई अधिनियम 2009 और उसके बाद टीईटी जैसी व्यवस्थाओं का मूल उद्देश्य शिक्षक गुणवत्ता सुधारना था और इस उद्देश्य से किसी को आपत्ति भी नहीं है लेकिन जब कोई नियम लागू होता है तो वह पहले से कार्यरत पर प्रभावी नहीं होता।
योग्य शिक्षक, प्रशिक्षित शिक्षक और जवाबदेह शिक्षक हर समाज की आवश्यकता हैं लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सुधार का अर्थ यह है कि पहले से नियुक्त लोगों पर पीछे की तारीख से नए मानदंड लाद दिए जाएँ? खेल शुरू होने के बाद नियम बदलना खेल भावना नहीं, संस्थागत असंतुलन है। जो शिक्षक आरटीई अधिनियम से पहले नियुक्त हुए उन्होंने उस समय की वैधानिक व्यवस्था के तहत नियुक्ति पाई। उन्होंने नौकरी पाने के लिए वही किया जो उस समय राज्य, चयन संस्था और कानून ने उनसे अपेक्षित किया।
यदि उस दौर में टीईटी अनिवार्य नहीं था तो आज उस कमी का दंड केवल शिक्षक क्यों भुगतें? तब की सरकारें, चयन बोर्ड, नियामक संस्थाएँ और नीतिनिर्माता क्या पूर्णतः निर्दोष थे? यदि व्यवस्था ने बिना टीईटी भर्ती की तो गलती व्यक्ति की कम और तंत्र की अधिक मानी जानी चाहिए। यह भी विचारणीय है कि कई ऐसे शिक्षक दो दशक या उससे अधिक समय से पढ़ा रहे हैं। उनके पढ़ाए छात्र आज सरकारी सेवाओं, निजी क्षेत्रों, व्यवसाय और समाज में स्थापित हैं।
क्या इतने वर्षों की सेवा, अनुभव, कक्षा प्रबंधन, स्थानीय सामाजिक समझ, बच्चों से संवाद क्षमता और व्यावहारिक शिक्षण कौशल का कोई मूल्य नहीं? क्या एक परीक्षा ही योग्यता का अंतिम प्रमाण है और अनुभव शून्य? टीईटी एक प्रवेश परीक्षा के रूप में उचित हो सकती है लेकिन सेवा में लगे पुराने शिक्षकों के लिए इसे नौकरी बचाने की शर्त बना देना संवेदनहीनता प्रतीत होता है। सुधार के नाम पर सुधार और दंड के नाम पर सुधार दोनों में अंतर है। पुराने शिक्षकों के लिए यदि प्रशिक्षण, ब्रिज कोर्स, दक्षता उन्नयन, समयबद्ध अकादमिक मूल्यांकन या चरणबद्ध मानकीकरण की व्यवस्था बनाई जाती तो वह न्यायपूर्ण रास्ता होता लेकिन सीधे अस्तित्व संकट पैदा करना न शिक्षक हित में है, न शिक्षा हित में।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का सम्मान आवश्यक है पर न्यायालय भी व्यापक न्याय, वैध अपेक्षा, प्राकृतिक न्याय और समानता जैसे सिद्धांतों को देखता है। लाखों परिवारों का भविष्य, वर्षों की सेवा, राज्यों की भर्ती प्रक्रियाएँ और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकताएँ इस मुद्दे से जुड़ी हैं।
न्याय केवल विधिक व्याख्या नहीं सामाजिक परिणाम भी है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि वर्षों पुराने शिक्षकों की नौकरी पर अस्थिरता आती है तो सबसे बड़ा नुकसान विद्यालयों को होगा। विशेषकर प्राथमिक विद्यालयों में जहाँ पहले ही शिक्षक कमी, संसाधन कमी और सीखने की चुनौतियाँ हैं वहाँ अनुभवी शिक्षकों को असुरक्षित करना बच्चों के हित में नहीं होगा।
शिक्षा तंत्र प्रयोगशाला नहीं है कि हर कुछ वर्ष में मानव संसाधन को अनिश्चितता में डाल दिया जाए। आज यदि पुनर्विचार याचिकाओं पर निर्णय आता है तो देशभर के शिक्षक केवल राहत नहीं न्याय की अपेक्षा कर रहे हैं। वे यह सुनना चाहते हैं कि नियम आगे के लिए कठोर हो सकते हैं लेकिन पीछे मुड़कर उन लोगों को दोषी नहीं ठहराया जाएगा जिन्होंने व्यवस्था के अनुसार जीवन जिया। पुराने नॉन-टीईटी शिक्षकों के पक्ष में खड़ा होना गुणवत्ता के खिलाफ खड़ा होना नहीं है।
यह उस सिद्धांत के पक्ष में खड़ा होना है कि नियम बनाइए, सख्ती कीजिए, मानक बढ़ाइए लेकिन उन्हें भविष्य से लागू कीजिए, अतीत को दंडित करके नहीं क्योंकि जब राज्य स्वयं अपने पुराने निर्णयों से मुकरता है तब सबसे बड़ा संकट नौकरी का नहीं विश्वास का होता है। भारत सरकार को भी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।
राजेश कटियार, कानपुर



