
निजी और सरकारी स्कूलों के बीच समानता न हो पाने के पीछे मुख्य रूप से संसाधन, बुनियादी ढांचा और फीस का अंतर है हालांकि दोनों के अपने फायदे और चुनौतियां भी हैं। सरकारी स्कूलों का उद्देश्य शिक्षा को हर वर्ग तक पहुंचाना है जबकि निजी स्कूल विशेष सेवाओं और सुविधाओं के लिए विकल्प प्रदान करते हैं।
वर्तमान में बराबरी की बहस तब तक बौद्धिक दिखावा बनी रहेगी जब तक हम यह स्वीकार नहीं करते कि निजी और सरकारी विद्यालयों का अंतर केवल भवन, फीस या परिणाम का नहीं बल्कि शिक्षाशास्त्रीय दृष्टि का भी है। सरकारी विद्यालयों में जहाँ शिक्षा को सामाजिक उत्तरदायित्व मानकर न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम समावेशन की लड़ाई लड़ी जा रही है वहीं निजी विद्यालय शिक्षा को बाजार की भाषा में आउटपुट और रैंक में तौलने का उपक्रम बन चुके हैं। दोनों ही जगह बच्चा केंद्र में नहीं है कहीं वह योजनाओं और आदेशों के बोझ तले दबा है तो कहीं प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं की चक्की में पिस रहा है।
शिक्षाशास्त्र कहता है कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चे के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास का संतुलन है पर सरकारी स्कूलों में आनंदमयी शिक्षा को अक्सर संसाधन-विहीन प्रयोगशाला बना दिया गया है जहाँ शिक्षक पर योजनाओं का बोझ, कागजी नवाचार और गैर-शैक्षणिक कार्य थोपकर यह मान लिया गया कि सीखना अपने आप हो जाएगा। परिणाम यह कि अनुशासनहीनता को स्वतंत्रता और अकादमिक शून्यता को आनंद का नाम दे दिया गया।
यह आनंद नहीं बल्कि उपेक्षा है। दूसरी ओर निजी विद्यालयों ने शिक्षाशास्त्र को प्रतियोगिता की गुलामी में झोंक दिया है। यहाँ सीखना परीक्षा-केन्द्रित, समय-सारिणी-निगल और परिणाम-आसक्त हो चुका है। बच्चे की जिज्ञासा, खेल, असफलता से सीखने का अधिकार सब सिलेबस पूरा हुआ या नहीं की बलि चढ़ जाते हैं। यह शिक्षा नहीं, प्रशिक्षण शिविर है जहाँ मनुष्य नहीं उत्पाद गढ़े जाते हैं। बराबरी का अर्थ यह नहीं कि सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की नकल सिखा दी जाए या निजी स्कूलों पर सरकारी ढर्रे की योजनाएँ थोप दी जाएँ।
बराबरी का अर्थ है समान शैक्षिक दर्शन। जहाँ सरकारी स्कूलों को संसाधन, शिक्षक-संख्या और अकादमिक स्वायत्तता मिले और निजी स्कूलों को बाल-मनोविज्ञान, तनाव-मुक्त सीखने और सामाजिक उत्तरदायित्व की अनिवार्यता स्वीकार करनी पड़े। आज की विडंबना यह है कि नीति-निर्माता आंकड़ों में बराबरी खोज रहे हैं जबकि कक्षा में असमानता गहरी होती जा रही है। जब तक शिक्षा को बच्चे के विकास से जोड़कर नहीं देखा जाएगा तब तक कहीं बचपन छीना जाएगा और कहीं सीखने का अधिकार। बराबरी की बात तब सार्थक होगी जब शिक्षा व्यवस्था संस्थानों की प्रतिष्ठा या नीतियों की सफलता नहीं, बल्कि बच्चे के मन, बुद्धि और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखेगी। इसके बिना हर सुधार, हर बहस और हर घोषणा सिर्फ एक और शिक्षाशास्त्रीय छलावा ही रहेगी।
राजेश कटियार,कानपुर
ये भी पढ़े- प्रत्येक परिषदीय विद्यालय की एक ब्रांड के रूप में हो पहचान : राजेश वर्मा प्राचार्य डायट



