
भारत में शिक्षा को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि निजीकरण यानी गुणवत्ता और सरकारी यानी असफलता। पिछले तीन चार दशकों में उदारीकरण और बाजारवाद ने शिक्षा को धीरे-धीरे अधिकार से हटाकर उत्पाद बना दिया। अब स्कूल ज्ञान के केंद्र कम और ब्रांडेड सर्विस सेंटर ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे में प्राइवेट स्कूलों के सरकारीकरण का सवाल भले आज की राजनीति में असंभव लगे लेकिन यह सवाल उठना इसलिए जरूरी है क्योंकि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु नहीं हो सकती। जब संविधान शिक्षा को मौलिक अधिकार मानता है तब यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि गुणवत्ता पर केवल अमीरों का कब्जा न हो।
आज देश में दो शिक्षा व्यवस्थाएँ साफ दिखाई देती हैं एक वह जहाँ स्मार्ट क्लास, एसी बसें, इंटरनेशनल टैग और लाखों की फीस है दूसरी वह जहाँ एक या दो शिक्षक पाँच कक्षाएँ संभाल रहा है। यह केवल संस्थागत अंतर नहीं यह लोकतंत्र के भीतर पैदा हुई शैक्षिक असमानता की खाई है। आखिर सवाल यह क्यों न पूछा जाए कि अगर शिक्षा समाज निर्माण का माध्यम है तो उसे पूरी तरह बाजार के हवाले क्यों कर दिया गया? कोई भी निजी स्कूल चाहे जितनी फीस बढ़ा दे, चाहे बच्चों और अभिभावकों पर कितना भी आर्थिक दबाव डाले उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है लेकिन सरकारी स्कूलों के लिए हर साल विलय, समायोजन, कम छात्र संख्या और अप्रासंगिकता जैसे शब्द तैयार रहते हैं।
यानी जो संस्थान गरीब के बच्चे को पढ़ाता है वही हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाता है। सच यह है कि निजी स्कूलों की सफलता का बड़ा हिस्सा शिक्षा से ज्यादा इमेज मैनेजमेंट पर आधारित है। कुछ टॉपर बच्चे, भारी विज्ञापन, अखबारों के पूरे-पूरे परिशिष्ट, चमकदार इमारतें और अंग्रेजी बोलता हुआ वातावरण इन्हीं के आधार पर शिक्षा की गुणवत्ता मापी जाने लगी। कोई यह नहीं पूछता कि इन स्कूलों में औसत और कमजोर बच्चों के साथ क्या होता है, मानसिक दबाव कितना है, फीस संरचना कितनी पारदर्शी है और शिक्षकों की वास्तविक स्थिति क्या है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकारी स्कूलों पर आरटीआई लागू है, सामाजिक जवाबदेही है, मीडिया की निगरानी है, अदालतों की टिप्पणियाँ हैं लेकिन निजी स्कूलों के मामले में वही समाज अचानक स्वायत्तता और संस्थान की स्वतंत्रता की बात करने लगता है।
आखिर क्यों? यदि शिक्षा सार्वजनिक महत्व का विषय है तो हर स्कूल सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में क्यों न आए? क्यों न निजी स्कूलों को भी पारदर्शी भर्ती, फीस नियमन, सामाजिक ऑडिट और कठोर उत्तरदायित्व व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए? असल में समस्या केवल शिक्षा की नहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। क्या आज का राजनीतिक नेतृत्व इतना साहस रखता है कि शिक्षा के मामले में अमीर और गरीब के साथ एक जैसा व्यवहार कर सके? क्या कोई नेता अपने बच्चे को उसी सरकारी स्कूल में भेजने का नैतिक उदाहरण देगा जहाँ गरीब का बच्चा पढ़ता है? जब तक सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली वर्ग खुद सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक सरकारी स्कूलों को सुधारने की वास्तविक राजनीतिक प्रतिबद्धता पैदा ही नहीं होगी।
यह भी समझना होगा कि सरकारीकरण का अर्थ केवल भवनों पर सरकारी ताला लगाना नहीं है। इसका अर्थ है शिक्षा को बाजार के बजाय सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत पर खड़ा करना। दुनिया के कई विकसित देशों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा इसलिए मजबूत है क्योंकि वहाँ शिक्षा को निवेश नहीं, समानता का आधार माना गया है। भारत में उल्टा हो रहा है अच्छी शिक्षा धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता की गुलाम बनती जा रही है। यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में शिक्षा केवल वर्ग विभाजन का सबसे बड़ा औजार बन जाएगी। एक वर्ग नेतृत्व करेगा क्योंकि उसने महंगे संस्थानों से पढ़ाई की होगी और दूसरा वर्ग केवल श्रम करेगा क्योंकि उसके हिस्से में संसाधनहीन शिक्षा आई होगी।
यह केवल शिक्षा का संकट नहीं लोकतंत्र की जड़ों के लिए खतरा है इसलिए यह सवाल पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश में शिक्षा का उद्देश्य नागरिक बनाना है या ग्राहक? यदि उद्देश्य नागरिक बनाना है तो फिर शिक्षा व्यवस्था को समानता, जवाबदेही और सार्वजनिक नियंत्रण की दिशा में ले जाना ही होगा क्योंकि जिस देश में स्कूल भी वर्ग देखकर अलग-अलग गुणवत्ता देने लगें वहाँ संविधान की समान अवसर वाली आत्मा धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
राजेश कटियार,कानपुर



