भीषण गर्मी में स्कूल समय पर पुनर्विचार जरूरी
बच्चों के स्वास्थ्य से आखिर समझौता क्यों?

कानपुर देहात। प्रदेश में पड़ रही भीषण गर्मी और तीखी धूप ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है, जिसका सबसे अधिक असर छोटे बच्चों पर देखने को मिल रहा है। वर्तमान में परिषदीय विद्यालयों का संचालन सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक किया जा रहा है जो इस मौसम में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है जबकि हर साल गर्मी अपने पूरे तेवर में आती है और हर साल वही तस्वीर दोहराई जाती है। कक्षा के भीतर तपता हुआ वातावरण, बाहर लू के थपेड़े और बीच में खड़े शिक्षक व बच्चे, जो पढ़ाई से ज्यादा हालात से जूझ रहे होते हैं। इसके बाद भावुक पोस्ट लिखी जाती हैं तस्वीरें साझा होती हैं और धीरे-धीरे यह मुद्दा केवल शिक्षक की मांग बनकर रह जाता है मानो यह किसी एक वर्ग की सुविधा का सवाल हो, न कि बच्चों के स्वास्थ्य और सीखने के अधिकार का। यहीं सबसे बड़ी समस्या है। जैसे ही शिक्षक अपनी या बच्चों की वास्तविक परेशानी सामने रखता है, उसे छुट्टी चाहने वाला या काम से बचने वाला मान लेने की एक तैयार मानसिकता सामने आ जाती है जबकि सच यह है कि शिक्षक ही वह पहला व्यक्ति होता है जो इन परिस्थितियों को रोज जी रहा होता है। वह केवल अपनी नहीं बच्चों की स्थिति को देख रहा होता है लेकिन उसकी आवाज को संवेदनशील सुझाव के बजाय निजी मांग में बदल दिया जाता है।
असल सवाल यह है कि क्या हर बार निर्णय नीचे से मांग उठने के बाद ही होंगे? क्या व्यवस्था इतनी प्रतिक्रियाशील ही रहेगी कि जब तक शोर न हो तब तक संवेदनशीलता सक्रिय न हो? मौसम विभाग की चेतावनियाँ, तापमान के आंकड़े, जमीनी हालात ये सब पहले से सामने होते हैं। ऐसे में यदि समय पर स्वतः और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिए जाएं तो न शिक्षक को अपीलकर्ता बनना पड़े और न ही बच्चों की तकलीफ को सोशल मीडिया का विषय बनाना पड़े। यह मुद्दा सुविधा का नहीं, समझ का है। यह छुट्टी लेने का नहीं परिस्थितियों के अनुकूल व्यवस्था बनाने का सवाल है। एक ऐसी व्यवस्था, जो यह मानकर चले कि बच्चे और शिक्षक किसी प्रयोगशाला के उपकरण नहीं हैं बल्कि जीवित संवेदनशील मनुष्य हैं, जिनकी अपनी शारीरिक सीमाएँ और जरूरतें हैं। यदि निर्णय लेने वाले लोग इस स्थिति को मांग के बजाय स्थिति के रूप में देखना शुरू कर दें तो शायद समाधान अपने आप निकल आएंगे। तब न कोई भावुक पोस्ट लिखने की जरूरत पड़ेगी, न ही किसी को सफाई देने की। शिक्षा का तंत्र तभी परिपक्व माना जाएगा जब वह समस्याओं के उठने का इंतजार नहीं करेगा बल्कि उन्हें पहले ही समझकर समय रहते मानवीय निर्णय ले सकेगा।



