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क्या रक्तदान से आती है शरीर में कमजोरी? इग्नू के वेबिनार में विशेषज्ञों ने खोला सबसे बड़ा वैज्ञानिक राज

एक यूनिट ब्लड और बचेंगी 3 जिंदगियां; जानिए भारत में क्यों है रक्तदाताओं की भारी कमी और क्या कहते हैं आंकड़े।

कानपुर देहात। कस्बा पुखरायां के रामस्वरूप ग्राम उद्योग परास्नातक महाविद्यालय (अध्ययन केंद्र 27211) और इग्नू क्षेत्रीय केंद्र लखनऊ के संयुक्त तत्वाधान में “वर्ल्ड ब्लड डोनर ऑब्जर्वेशन डे” पर एक विशेष वेबिनार का आयोजन किया गया। इस ऑनलाइन संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य समाज में रक्तदान के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करना और लोगों में जागरूकता लाकर रक्तदाताओं का उत्साहवर्धन करना था।

वेबिनार की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक एवं प्रमुख डॉ. अनिल कुमार मिश्र ने कहा कि रक्तदान केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और सेवा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “रक्तदान ही महादान है,” क्योंकि इसके माध्यम से किसी मरते हुए व्यक्ति को नया जीवन दिया जा सकता है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और पीजीआई लखनऊ के अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन ने अपने उद्बोधन में एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि रक्त हमारे शरीर का एक ऐसा अनमोल तत्व है, जिसे किसी भी कारखाने या फैक्ट्री में निर्मित नहीं किया जा सकता। सड़क दुर्घटनाओं, गंभीर बीमारियों, बड़े ऑपरेशनों और प्रसव के समय मरीजों को खून की सख्त जरूरत होती है। ऐसे समय में स्वैच्छिक रक्तदाता ही मसीहा बनकर किसी के जीवन को बचाने का माध्यम बनते हैं।

विशिष्ट वक्ता डॉ. पल्लवी रानी ने देश और दुनिया में रक्तदाताओं के आंकड़ों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारत में प्रत्येक 10 में से एक व्यक्ति को कभी न कभी रक्त की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, देश की कुल आबादी और जरूरत के सापेक्ष फिलहाल रक्तदाताओं की संख्या काफी कम है, जिसके कारण कई बार समय पर खून न मिलने से लोगों की जान चली जाती है। उन्होंने बताया कि जन जागरूकता के जरिए ही इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है। रक्तदान का सबसे बड़ा वैज्ञानिक लाभ यह है कि एक यूनिट रक्त से कई मरीजों की जान बचाई जा सकती है, क्योंकि रक्त के विभिन्न घटकों जैसे—लाल रक्त कण (RBC), प्लाज्मा और प्लेटलेट्स का अलग-अलग मरीजों के इलाज में उपयोग किया जाता है।

वेबिनार की कन्वीनर डॉ. अनामिका सिन्हा ने मंच संचालन करते हुए समाज में फैले भ्रमों पर चोट की। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग सोचते हैं कि रक्तदान करने से शरीर में कमजोरी आ जाती है, जो कि पूरी तरह गलत है। एक स्वस्थ व्यक्ति चिकित्सकीय जांच के बाद सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकता है और हमारा शरीर बहुत ही कम समय में इसकी प्राकृतिक रूप से पूर्ति कर लेता है।

कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए पुखरायां अध्ययन केंद्र के समन्वयक डॉ. पर्वत सिंह ने युवाओं से एक बड़ी अपील की। उन्होंने कहा कि “एक बूंद रक्त नहीं, किसी के जीवन की आशा है।” युवाओं को इस पुनीत कार्य के लिए आगे आकर स्वैच्छिक रक्तदान को एक बड़ा सामाजिक आंदोलन बनाना होगा। इस डिजिटल आयोजन में क्षेत्रीय निदेशक डॉ. रीना कुमारी, डॉ. जयप्रकाश वर्मा, सहायक कुल सचिव डॉ. निशीथ नागर सहित विभिन्न अध्ययन केंद्रों के समन्वयक, शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं ऑनलाइन जुड़े रहे।


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