भारत में गहराता शैक्षिक विभाजन: नागरिक बनाने की जगह ग्राहक बना रही बाजारवादी शिक्षा
देश में पिछले कुछ दशकों के दौरान उदारीकरण और बाजारवाद के प्रभाव से शिक्षा धीरे-धीरे मौलिक अधिकार के बजाय एक ब्रांडेड सेवा में बदल चुकी है

राजेश कटियार, कानपुर देहात। देश में पिछले कुछ दशकों के दौरान उदारीकरण और बाजारवाद के प्रभाव से शिक्षा धीरे-धीरे मौलिक अधिकार के बजाय एक ब्रांडेड सेवा में बदल चुकी है। आज भारत में शिक्षा दो धड़ों में बँटी नजर आती है। एक तरफ लाखों की फीस, एसी बसें और स्मार्ट क्लास वाले निजी स्कूल हैं तो दूसरी तरफ संसाधनों की कमी से जूझते सरकारी स्कूल। इस बढ़ती शैक्षिक असमानता ने लोकतंत्र की नींव पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। निजी स्कूलों की सफलता का बड़ा हिस्सा वास्तविक शिक्षा से ज्यादा विज्ञापन, चमकदार इमारतों और इमेज मैनेजमेंट पर आधारित है जबकि औसत छात्रों के मानसिक दबाव और शिक्षकों की स्थिति पर अक्सर पर्दा पड़ा रहता है। अगर यही स्थिति रही तो शिक्षा समाज में समानता लाने के बजाय वर्ग विभाजन का सबसे बड़ा हथियार बन जाएगी जहाँ महँगी शिक्षा प्राप्त वर्ग नेतृत्व करेगा और दूसरा वर्ग केवल श्रम तक सीमित रह जाएगा।
जवाबदेही के मामले में भी दोहरा मापदंड साफ दिखाई देता है। सरकारी स्कूल आरटीआई, सामाजिक ऑडिट और मीडिया निगरानी के दायरे में रहते हैं जबकि निजी स्कूलों के मामलों में स्वायत्तता के नाम पर पारदर्शिता का अभाव देखने को मिलता है। शिक्षाविदों का मानना है कि यदि शिक्षा सार्वजनिक हित का विषय है तो निजी संस्थानों को भी पारदर्शी भर्ती, फीस नियमन और सामाजिक ऑडिट के कठोर दायरे में लाया जाना आवश्यक है।
असल समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की है। जब तक सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली वर्ग के बच्चे सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक सरकारी स्कूलों के सुधार के लिए वास्तविक प्रतिबद्धता पैदा होना कठिन है। दुनिया के कई विकसित देशों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा इसलिए मजबूत है क्योंकि वहाँ शिक्षा को व्यापार के बजाय समानता का आधार माना गया है। भारत में शिक्षा यदि संविधान की समान अवसर की आत्मा को बचाना है तो शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ने के बजाय समानता, जवाबदेही और सार्वजनिक नियंत्रण की दिशा में ले जाना ही होगा।



