नेताओं के साथ फोटो खिंचवाने को लोग समझते हैं बड़प्पन, झूठी शान में परेशान है आदमी
आजकल सोशल मीडिया खोलो तो लगता है देश का विकास फाइलों, योजनाओं और नीतियों से कम, सेल्फियों से ज्यादा चल रहा है। हर दूसरा आदमी किसी न किसी महत्वपूर्ण हस्ती के साथ खड़ा दिखाई देता है। फोटो में मुस्कान ऐसी जैसे अभी-अभी देश की सबसे बड़ी समस्या पर ऐतिहासिक समझौता करके निकले हों

राजेश कटियार,कानपुर देहात। आजकल सोशल मीडिया खोलो तो लगता है देश का विकास फाइलों, योजनाओं और नीतियों से कम, सेल्फियों से ज्यादा चल रहा है। हर दूसरा आदमी किसी न किसी महत्वपूर्ण हस्ती के साथ खड़ा दिखाई देता है। फोटो में मुस्कान ऐसी जैसे अभी-अभी देश की सबसे बड़ी समस्या पर ऐतिहासिक समझौता करके निकले हों। सोशल प्लेटफॉर्म पर कुछ ऐसे लिखते हैं कि आज नेता जी से क्षेत्र के विकास, युवाओं के भविष्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार और वैश्विक शांति पर सार्थक चर्चा हुई। अब भगवान जाने पाँच सेकेंड की उस फोटो में इतना सब कब हो गया। कमाल की बात यह है कि सोशल मीडिया पर कोई भी मुलाकात निजी नहीं होती। आदमी अगर गलती से चाय पीने भी चला जाए किसी नेता, अफसर या बड़े आदमी के पास तो लौटते-लौटते वह जनहित के मुद्दों पर गंभीर वार्ता बन जाती है और अगर सेल्फी थोड़ी तिरछी एंगल से आ जाए तो समझो राष्ट्रहित में गुप्त रणनीतिक बैठक संपन्न हो चुकी है। कई बार तो लगता है कि असली विकास सड़क, अस्पताल और स्कूलों में नहीं फेसबुक की टाइमलाइन पर हो रहा है। जो जितना बड़ा फोटो, उतना बड़ा समाजसेवी। जो जितनी बार माननीय जी के कंधे से सटा दिख जाए, उतना बड़ा चिंतक। आदमी की योग्यता अब उसके काम से कम और वीआईपी के साथ उसकी फोटो की क्वालिटी से ज्यादा नापी जाने लगी है। भले ही वह छोटा-मोटा काम भी अपने नेताजी से न करवा पाए लेकिन फेंकेगा इस तरीके से जैसे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री वही हो और एक हम हैं बैठे हैं चुपचाप। न कोई बुलाने वाला, न कोई आइए-आइए कहने वाला। कभी-कभी मन करता है कि कोई बड़ा आदमी खुद ही सामने से आकर कह दे भइया तुम भी आ जाओ, एक सेल्फी ले लो, थोड़ा सार्वजनिक हित पर चर्चा कर लो, समाज को भी पता चले कि तुम जीवित हो लेकिन फिर भीतर से आवाज आती है तुझसे न हो पायेगा क्योंकि इसके लिए केवल मुलाकात नहीं एक खास किस्म की प्रतिभा चाहिए। चेहरा ऐसा होना चाहिए जिसमें हर फोटो में राष्ट्र चिंता झलके चाहे भीतर मन समोसे पर अटका हो। बातचीत ऐसी होनी चाहिए जिसमें विकास, विजन,समर्पण, जनहित, नई दिशा जैसे शब्द अपने आप निकलें और सबसे जरूरी सेल्फी पोस्ट होते ही कमेंट बॉक्स में वाह सर, गर्व है आप पर, आप ही उम्मीद हैं लिखने वाली स्थायी डिजिटल सेना भी चाहिए। अब तो हालत यह है कि कुछ लोग जीवन में काम बाद में करते हैं पहले उसकी फोटो खिंचवा लेते हैं। असली उपलब्धि काम नहीं उसके साथ खड़े दिख जाना है। और सोशल मीडिया ने इस कला को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब हर आदमी अपने मोहल्ले का अनौपचारिक राजदूत है जो हर फोटो के जरिए देश और दुनिया को यह भरोसा दिला रहा है कि विकास की गाड़ी फिलहाल उसकी टाइमलाइन से होकर गुजर रही है। यही कारण है कि दिखावे और दूसरों को प्रभावित करने की चाहत में इंसान अपनी वास्तविक खुशी और सुकून को खोता जा रहा है।



