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ई-पंजीयन व्यवस्था के विरोध में डेरापुर में अधिवक्ताओं की हड़ताल पांचवें दिन भी जारी

कानपुर देहात के डेरापुर तहसील परिसर में ई-पंजीयन (ऑनलाइन रजिस्ट्री) व्यवस्था के विरोध में अधिवक्ताओं की कलमबंद हड़ताल बुधवार को लगातार पांचवें दिन भी जारी रही। अधिवक्ताओं ने तहसील परिसर में बैठक कर शासन की नई व्यवस्था के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की और मांगों के समर्थन में एकजुट होकर आवाज बुलंद की

डेरापुर। कानपुर देहात के डेरापुर तहसील परिसर में ई-पंजीयन (ऑनलाइन रजिस्ट्री) व्यवस्था के विरोध में अधिवक्ताओं की कलमबंद हड़ताल बुधवार को लगातार पांचवें दिन भी जारी रही। अधिवक्ताओं ने तहसील परिसर में बैठक कर शासन की नई व्यवस्था के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त की और मांगों के समर्थन में एकजुट होकर आवाज बुलंद की।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि ई-पंजीयन व्यवस्था के निजीकरण से पारंपरिक पंजीयन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। उनका आरोप है कि इस व्यवस्था से अधिवक्ताओं की भूमिका सीमित होगी तथा आम नागरिकों को भी विभिन्न तकनीकी और व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अधिवक्ताओं ने कहा कि न्यायिक और राजस्व संबंधी प्रक्रियाओं में अधिवक्ता समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए उनकी आपत्तियों की अनदेखी कर लागू की गई व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है।

अधिवक्ताओं ने सरकार से ई-पंजीयन व्यवस्था पर पुनर्विचार करने और अधिवक्ता संगठनों से वार्ता कर उनकी समस्याओं का समाधान निकालने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि मांगें पूरी न होने तक आंदोलन और कलमबंद हड़ताल जारी रहेगी। अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक शासन उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार कर उचित निर्णय नहीं लेता, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। साथ ही प्रदेश स्तर पर चल रहे आंदोलन को भी पूर्ण समर्थन देने का संकल्प लिया गया।
इस अवसर पर अधिवक्ता परिषद के महामंत्री हरिशंकर संखवार, संतोष कुमार यादव, बउअन शर्मा, मनोज कुमार पाल, अरुण कुमार गुप्ता, गिरेंद्र सिंह गौर, शिव शंकर चतुर्वेदी, अमित तिवारी, संजय पाल, प्रशांत दीक्षित, अमर सिंह गौर, अजय यादव, मोहित पाल, राम मोहन अवस्थी और श्याम जी श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता उपस्थित रहे।
हड़ताल के चलते तहसील परिसर में न्यायिक एवं राजस्व कार्यों पर भी प्रभाव देखने को मिला। कई वादकारियों और आम नागरिकों को अपने कार्यों के लिए इंतजार करना पड़ा। अधिवक्ताओं ने कहा कि यह आंदोलन केवल उनके हितों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था और आम जनता की सुविधाओं को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।

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