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शिक्षक को न समझे बिजली का स्विच, शिक्षक पर उँगली उठाना बौद्धिक बेईमानी

शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का दूत नहीं होता वह कक्षा में खड़ा एक जीवित विवेक होता है।

राजेश कटियार, कानपुर देहात। सबसे खतरनाक और सुविधाजनक भ्रम है कि शिक्षक की भूमिका केवल आदेशों का पालन करने तक सीमित है। जैसे शिक्षक कोई स्विच हो ऊपर से निर्देश आए और नीचे क्रियान्वयन हो जाए। समाज और व्यवस्था दोनों ही अक्सर इसी धारणा में सुकून महसूस करते हैं क्योंकि इससे जिम्मेदारी का बोझ अपने कंधों से उतर जाता है। अगर परिणाम अच्छे नहीं आए तो उँगली शिक्षक पर और अगर सब ठीक चला तो श्रेय व्यवस्था का। यही सबसे बड़ी बौद्धिक बेईमानी है।

शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक का दूत नहीं होता वह कक्षा में खड़ा एक जीवित विवेक होता है। वह बच्चों के सवालों से रोज टकराता है उनकी जिज्ञासाओं, भय और संभावनाओं को अपने सामने खुलते देखता है। आदेश कागज पर लिखे जाते हैं लेकिन उनका असर जमीन पर बच्चों के दिमाग और भविष्य पर पड़ता है। इस अंतर को समझने की जहमत समाज अक्सर नहीं उठाता। आदेश मानने की अपेक्षा तो रखी जाती है पर यह नहीं पूछा जाता कि वह आदेश बच्चों के जीवन में क्या बदल रहे हैं। विडंबना यह है कि जब भी शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार की बात होती है, शिक्षक को सबसे पहले अनुशासन में लाने का लक्ष्य बनाया जाता है। प्रशिक्षण, निरीक्षण, मूल्यांकन सबका उद्देश्य यही मान लिया जाता है कि शिक्षक को और अधिक नियंत्रित किया जाए। यह मानकर चला जाता है कि शिक्षक सोचने लगे तो व्यवस्था बिगड़ जाएगी।

दरअसल डर यह है कि अगर शिक्षक सचमुच सोचने लगा, सवाल पूछने लगा, तो कई खोखले आदेश टिक नहीं पाएँगे। समाज भी इस खेल में बराबर का भागीदार है। वही समाज जो अपने बच्चों की हर कमी का ठीकरा स्कूल पर फोड़ देता है, वही समाज शिक्षक से यह उम्मीद नहीं करता कि वह व्यवस्था से सवाल पूछे। शिक्षक आदर्श बने, त्यागी बने, राष्ट्रनिर्माता बने लेकिन चुपचाप बने। बोलने वाला शिक्षक असुविधाजनक हो जाता है और असुविधाजनक सच किसी को पसंद नहीं आता। असलियत यह है कि शिक्षा में कोई भी वास्तविक बदलाव बिना शिक्षक की सक्रिय भूमिका के संभव ही नहीं है। पाठ्यक्रम बदल देने से, ऐप बना देने से या नई योजनाएँ घोषित कर देने से शिक्षा नहीं बदलती।

शिक्षा तब बदलती है जब शिक्षक उन बदलावों को समझता है, उन्हें अपने अनुभव से परखता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें चुनौती भी देता है। जो शिक्षक केवल आदेश मानता है, वह व्यवस्था को चला सकता है लेकिन उसे बेहतर नहीं बना सकता इसलिए यह कहना कि शिक्षक सिर्फ आदेश मानने वाला कर्मचारी है, न केवल शिक्षक का अपमान है बल्कि समाज के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। शिक्षक बदलाव का वाहक तभी बन सकता है, जब उसे सोचने, बोलने और असहमति जताने का नैतिक अधिकार दिया जाए। व्यवस्था को यह तय करना होगा कि उसे आज्ञाकारी भीड़ चाहिए या विवेकशील नागरिक। और समाज को यह समझना होगा कि शिक्षक की आवाज़ दबाकर वह अपने ही बच्चों के भविष्य को चुप करा रहा है।

अब समय है कि शिक्षक को केवल निर्देशों का पालनकर्ता मानने की सुविधा छोड़ दी जाए। अगर शिक्षा को सचमुच सुधारना है, तो शिक्षक को केंद्र में लाना होगा—केवल जिम्मेदारी देने के लिए नहीं, बल्कि अधिकार और विश्वास देने के लिए भी। वरना हम हर साल नई योजनाओं, नए आदेशों और वही पुराने नतीजों के बीच घूमते रहेंगे और दोष हमेशा उसी पर डालेंगे जो सबसे सामने सबसे ईमानदारी से खड़ा है।

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