यूपी बोर्ड परीक्षा में परिषदीय शिक्षकों की ड्यूटी लगाना नियम विरुद्ध
50 फीसदी सरकारी योजनाओं का संचालन करते हैं परिषदीय स्कूलों के शिक्षक

राजेश कटियार, कानपुर देहात। यह सवाल अब केवल व्यवस्था का नहीं प्राथमिक शिक्षा के सम्मान और प्राथमिकता का सवाल बन चुका है। देश में बोर्ड परीक्षाएँ केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं होतीं। सीबीएसई और आईसीएसई जैसे बोर्ड भी हर साल बड़े पैमाने पर परीक्षाएँ कराते हैं और वे अपने ही संस्थानों के स्टाफ, अपने संसाधनों और अपनी व्यवस्थाओं के सहारे यह कार्य अच्छे से पूरा करते हैं।
उन्हें न तो प्राथमिक शिक्षकों की आवश्यकता पड़ती है और न ही अन्य विभागों के कर्मचारियों की स्थायी निर्भरता बनानी पड़ती है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाएँ माध्यमिक विद्यालयों के अपने शिक्षकों और स्टाफ के सहारे क्यों नहीं कराई जा सकतीं?
वास्तविक समस्या संसाधनों की कमी से अधिक सोच की कमी है। बेसिक शिक्षा के शिक्षक व्यवस्था की नजर में हमेशा एक उपलब्ध संसाधन की तरह देखे गए हैं जहाँ आवश्यकता हुई वहीं लगा दिया। कभी चुनाव, कभी जनगणना, कभी सर्वेक्षण, कभी पुनरीक्षण अभियान, कभी बीएलओ ड्यूटी और अब यू पी बोर्ड परीक्षाएँ।
सवाल यह नहीं कि ये कार्य महत्वपूर्ण नहीं हैं। सवाल यह है कि क्या प्राथमिक शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं है? क्या कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों का नियमित शिक्षण इतना गौण है कि उसे बार-बार बाधित किया जा सके? विडंबना यह है कि एक ही समय में कई अभियानों का दबाव बना दिया जाता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण, पंचायत पुनरीक्षण, बीएलओ कार्य और अब बोर्ड परीक्षा ड्यूटी। परिणाम यह होता है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक की उपलब्धता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। कागजों में स्कूल खुले रहते हैं पर कक्षाओं में शिक्षण का प्रवाह टूट जाता है। जिन बच्चों को बुनियादी भाषा और गणित की सबसे अधिक आवश्यकता है, वही सबसे अधिक उपेक्षित हो जाते हैं।
यह भी सोचने का विषय है कि जब माध्यमिक स्तर पर सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी विद्यालयों की बड़ी संख्या मौजूद है तो परीक्षा प्रबंधन के लिए उसी व्यवस्था को मजबूत क्यों नहीं किया जाता? परीक्षा केंद्र भले 20-30 प्रतिशत विद्यालय ही बनते हों लेकिन पर्यवेक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी उसी स्तर के शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच बाँटी जा सकती है। हर बार बेसिक शिक्षा को थोक के भाव झोंक देना प्रशासनिक सुविधा तो हो सकती है लेकिन यह शैक्षिक दृष्टि से दूरदर्शिता नहीं है।
समस्या का एक गंभीर मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब बार-बार बेसिक शिक्षकों को हर अतिरिक्त कार्य के लिए सबसे पहले चुना जाता है तो यह संदेश जाता है कि उनका मूल कार्य शिक्षण व्यवस्था की प्राथमिकता नहीं है। यह स्थिति न केवल कार्य-संतोष को प्रभावित करती है बल्कि प्राथमिक शिक्षा की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी कमजोर करती है।
अब समय आ गया है कि जिम्मेदार स्तर पर गंभीर चिंतन किया जाए। क्या प्रत्येक विभाग को अपने मूल कार्य के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जाना चाहिए? क्या बोर्ड परीक्षाओं के लिए एक स्वतंत्र, प्रशिक्षित और स्थायी प्रबंधन तंत्र विकसित नहीं किया जा सकता? क्या विभिन्न प्रशासनिक और निर्वाचन कार्यों की समय-सारिणी इस तरह नहीं बनाई जा सकती कि प्राथमिक शिक्षा प्रभावित न हो? शिक्षा व्यवस्था की सबसे मजबूत नींव प्राथमिक स्तर होता है।
यदि यही स्तर बार-बार बाधित होगा तो ऊपर की पूरी संरचना कमजोर होती जाएगी। बोर्ड परीक्षा का सुचारु संचालन महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कक्षा में बैठा वह छोटा बच्चा रोज अपने शिक्षक को उपलब्ध पाए। प्रशासनिक सुविधा और शैक्षिक प्राथमिकता के बीच संतुलन बनाना ही अब सबसे बड़ी आवश्यकता है।
यदि व्यवस्था सचमुच शिक्षा सुधार को लेकर गंभीर है तो उसे यह तय करना होगा कि बेसिक शिक्षा उपलब्ध मानव संसाधन नहीं बल्कि भविष्य निर्माण का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जब यह समझ नीति का हिस्सा बनेगी तभी प्राथमिक विद्यालयों में स्थिरता, सम्मान और गुणवत्ता का वातावरण बन सकेगा।



