बेसिक शिक्षा में क्या हर नया आदेश नवाचार होता है
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा जगत में एक शब्द सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ है नवाचार। कोई नई गतिविधि शुरू हुई तो नवाचार। कोई नया पोर्टल बन गया तो नवाचार। कोई नया प्रारूप आ गया तो नवाचार। कोई नई रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू हो गई तो नवाचार

राजेश कटियार,कानपुर देहात। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा जगत में एक शब्द सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ है नवाचार। कोई नई गतिविधि शुरू हुई तो नवाचार। कोई नया पोर्टल बन गया तो नवाचार। कोई नया प्रारूप आ गया तो नवाचार। कोई नई रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू हो गई तो नवाचार। ऐसा लगता है मानो शिक्षा में अब किसी भी चीज के आगे नया शब्द जोड़ दीजिए वह अपने आप नवाचार बन जाती है। यहीं से भ्रम शुरू होता है। नया होना और नवाचारी होना, दोनों अलग बातें हैं। हर नया प्रयोग उपयोगी नहीं होता और हर पुरानी व्यवस्था बेकार नहीं होती। यदि केवल नया होना ही नवाचार की कसौटी है तो हर साल बदलने वाला टाइम-टेबल भी नवाचार है, हर महीने बदलने वाला व्हाट्सऐप फॉर्मेट भी नवाचार है और हर सप्ताह आने वाला नया निर्देश भी नवाचार है फिर तो शिक्षा का इतिहास नवाचारों से भरा पड़ा होना चाहिए जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। शिक्षा में किसी भी परिवर्तन की पहली कसौटी यह नहीं होनी चाहिए कि वह कितना नया है। पहली कसौटी यह होनी चाहिए कि उससे बच्चे का सीखना कितना बेहतर हुआ।
यदि किसी नए आदेश से शिक्षक का समय अधिक रिपोर्टिंग में जाने लगे, कक्षा का समय कम हो जाए और बच्चे की समझ में कोई विशेष अंतर न आए तो उसे नवाचार कहना शिक्षा शब्द के साथ अन्याय होगा। दरअसल आज शिक्षा में एक नई प्रवृत्ति विकसित हुई है। मैं इसे नवाचारवाद कहता हूँ। इसमें हर नई योजना को बिना प्रश्न पूछे स्वीकार कर लेना ही आधुनिकता मान लिया जाता है। जैसे प्रश्न पूछना पिछड़ापन हो और हर नए प्रयोग पर ताली बजाना प्रगतिशीलता जबकि विज्ञान का पहला नियम है, हर नए विचार को प्रमाण की कसौटी पर परखो। शिक्षा विज्ञान इससे अलग कैसे हो सकती है? दुनिया का कोई भी सफल नवाचार पहले संदेह, परीक्षण और मूल्यांकन से गुजरा है। चिकित्सा में नई दवा हो, कृषि में नई तकनीक हो, उद्योग में नई मशीन हो या शिक्षा में नई पद्धति, किसी को भी केवल नया होने के कारण स्वीकार नहीं किया गया। पहले पूछा गया क्या यह वास्तव में पहले से बेहतर है? यदि उत्तर हाँ मिला तो वह नवाचार कहलाया। यही प्रश्न हमें शिक्षा में भी पूछना होगा। क्या हर नया आदेश वास्तव में सीखने को बेहतर बना रहा है? क्या हर नई गतिविधि बच्चों के बौद्धिक विकास में योगदान दे रही है? क्या हर नया प्रारूप शिक्षक का समय बचा रहा है या और अधिक खा रहा है? क्या हर नया पोर्टल पारदर्शिता बढ़ा रहा है या केवल डेटा का बोझ?
नवाचार का अर्थ परिवर्तन नहीं सार्थक परिवर्तन है। ऐसा परिवर्तन जो समस्या का समाधान करे, प्रक्रिया को सरल बनाए और परिणाम को बेहतर करे। यदि समस्या जस की तस रहे और केवल उसका प्रारूप बदल जाए तो वह नवाचार नहीं केवल प्रशासनिक हलचल है। इसलिए मेरा आग्रह केवल इतना है कि शिक्षा में नया शब्द का सम्मान बना रहना चाहिए। हर नए आदेश को नवाचार कह देने से नवाचार का महत्व ही कम हो जाता है। हमें व्यक्ति नहीं, विचार की समीक्षा करनी चाहिए, आदेश नहीं, परिणाम देखने चाहिए और सबसे बढ़कर यह देखना चाहिए कि इस पूरे बदलाव के केंद्र में बच्चा है या केवल व्यवस्था क्योंकि शिक्षा में असली नवाचार वही है जिसके बाद शिक्षक कम उलझे, बच्चा अधिक सीखे और विद्यालय पहले से बेहतर हो जाए। बाकी सब पर चर्चा हो सकती है लेकिन उन्हें बिना परीक्षा दिए नवाचार की उपाधि देना शायद शिक्षा के साथ न्याय नहीं होगा।



