सरकारी स्कूलों के होनहार बच्चे प्राइवेट स्कूलों की तरफ कर रहे हैं पलायन

कानपुर देहात। सरकारी शिक्षा व्यवस्था के भीतर शायद ही कोई ऐसा विरोधाभास होगा जो परिषदीय विद्यालयों के शिक्षकों की स्थिति से बड़ा हो। एक ओर सरकार हमसे कहती है कि अपने विद्यालयों का नामांकन बढ़ाइए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दीजिए, समाज का विश्वास जीतिए दूसरी ओर वही व्यवस्था हमें निर्देश देती है कि आरटीई के अंतर्गत निजी विद्यालयों में बच्चों का प्रवेश कराइए, नवोदय विद्यालयों के लिए आवेदन भरवाइए, केंद्रीय विद्यालयों के लिए बच्चों को तैयार कीजिए, सैनिक, आश्रम पद्धति, सर्वोदय, श्रम एवं अन्य विशेष विद्यालयों के लिए भी पात्र बच्चों के फॉर्म भरवाइए। प्रश्न यह नहीं है कि इन विद्यालयों में बच्चे क्यों जाएँ। निश्चित रूप से जहाँ बच्चे को बेहतर अवसर मिले वहाँ उसका स्वागत होना चाहिए। असली प्रश्न यह है कि क्या कोई भी संस्था अपने सबसे अच्छे विद्यार्थियों को लगातार बाहर भेजते हुए स्वयं भी उतनी ही मजबूत रह सकती है? विडंबना यह है कि जिन बच्चों में जिज्ञासा अधिक होती है, जिनका शैक्षणिक आधार मजबूत होता है जिनके अभिभावक अपेक्षाकृत जागरूक होते हैं, वही बच्चे इन प्रतियोगी प्रवेशों में सफल होते हैं। परिणाम यह होता है कि परिषदीय विद्यालय अपने सबसे सक्रिय, सबसे प्रेरित और सबसे संभावनाशील विद्यार्थियों को हर वर्ष धीरे-धीरे खोते जाते हैं। शिक्षा शास्त्र में इसे प्रतिभा पलायन या ब्रेन ड्रेन कहा जाता है। जब किसी संस्था से उसके सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी लगातार बाहर जाते रहें तो उस संस्था के शैक्षणिक वातावरण, प्रतिस्पर्धा, प्रेरणा और परिणाम सब पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि बाद में उसी विद्यालय की तुलना उन्हीं संस्थाओं से की जाती है, जिनके लिए बच्चों को भेजने का काम भी उसी विद्यालय के शिक्षक ने किया था। यानी बल्लेबाजी भी हम करें, रन भी दूसरे के खाते में जाएँ और फिर मैच हारने का आरोप भी हम पर लगे।
यह कैसी व्यवस्था है जिसमें एक शिक्षक को अपने ही विद्यालय से प्रतिभा निकालकर दूसरे विद्यालयों तक पहुँचाने का दायित्व भी दिया जाता है और बाद में उससे पूछा जाता है कि तुम्हारे विद्यालय के परिणाम उत्कृष्ट क्यों नहीं हैं? नामांकन क्यों घट रहा है? यह किसी भी विद्यालय या योजना का विरोध नहीं है। नवोदय, केंद्रीय विद्यालय, सैनिक विद्यालय, आरटीई या अन्य संस्थाएँ अपनी-अपनी भूमिका निभा रही हैं और अनेक बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन भी लाती हैं। प्रश्न इन संस्थाओं के अस्तित्व का नहीं, बल्कि नीति के संतुलन का है। यदि परिषदीय विद्यालय ही हर श्रेष्ठ विद्यार्थी के लिए केवल एक लॉन्चिंग पैड बनकर रह जाएँ और उनकी अपनी शैक्षणिक पहचान लगातार कमजोर होती जाए तो अंततः सबसे बड़ा नुकसान उसी सरकारी शिक्षा व्यवस्था का होगा जिसे मजबूत करने की बात हर मंच से कही जाती है।अब समय आ गया है कि नीति निर्माता इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर दें। क्या परिषदीय विद्यालय केवल अन्य संस्थाओं के लिए प्रतिभा खोजने का माध्यम हैं या उन्हें स्वयं भी उत्कृष्ट विद्यालय बनाना है? यदि उत्तर दूसरा है तो ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार होना चाहिए जो लगातार उन्हीं विद्यालयों की शैक्षणिक ऊर्जा को बाहर स्थानांतरित करती रहती हैं। किसी भी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उसके अच्छे बच्चों को अवसर देना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि मूल विद्यालयों की जीवंतता, प्रतिस्पर्धा और आत्मविश्वास सुरक्षित रहे। वरना एक दिन हम यह पूछते रह जाएँगे कि हमारे विद्यालयों में गुणवत्ता क्यों नहीं बची जबकि उसकी सबसे उपजाऊ जमीन तो हम स्वयं हर वर्ष उखाड़कर दूसरी जगह रोपते रहे।



